देश: में जातीय जनगणना (Caste Census) को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस पार्टी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया को जानबूझकर टाल रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि घोषणा के एक साल बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
एक साल बाद भी स्पष्ट नहीं प्रक्रिया
कांग्रेस का कहना है कि 30 अप्रैल 2025 को सरकार ने आगामी जनगणना में जातीय गणना शामिल करने का ऐलान किया था, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह प्रक्रिया कैसे पूरी की जाएगी। न तो कोई विस्तृत रोडमैप सामने आया है और न ही राज्यों या विशेषज्ञों से इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा की गई है।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि सरकार इस विषय पर पारदर्शिता नहीं बरत रही है, जिससे संदेह पैदा होता है कि कहीं इसे जानबूझकर टाला तो नहीं जा रहा।
सरकार के रुख पर उठे सवाल
कांग्रेस ने अपने आरोपों को मजबूत करने के लिए सरकार के पिछले बयानों का भी हवाला दिया है। पार्टी का कहना है कि 2021 में केंद्र सरकार ने संसद और सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा था कि वह जातिवार जनगणना के पक्ष में नहीं है।
इसके बाद 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में जातीय जनगणना की मांग को ‘अर्बन नक्सल सोच’ बताया था। ऐसे में 2025 में अचानक घोषणा करना और फिर एक साल तक कोई ठोस कदम न उठाना, कांग्रेस के मुताबिक “यू-टर्न” की ओर इशारा करता है।

खरगे के पत्र का भी नहीं मिला जवाब
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को कई बार पत्र लिखकर जातीय जनगणना की मांग की थी। अप्रैल 2023 और मई 2025 में भेजे गए पत्रों में उन्होंने जनगणना के साथ जातीय आंकड़ों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
हालांकि, कांग्रेस का आरोप है कि इन पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही।
विपक्ष का दावा—राजनीतिक कारणों से देरी
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का मानना है कि जातीय जनगणना सामाजिक न्याय और नीतिगत फैसलों के लिए बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि इससे समाज के विभिन्न वर्गों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी, जिससे आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू किया जा सकेगा।
लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार राजनीतिक कारणों से इस प्रक्रिया को टाल रही है, क्योंकि इसके परिणाम सत्ता संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
सरकार की चुप्पी और बढ़ता दबाव
अब तक केंद्र सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जातीय जनगणना एक जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया है, जिसके लिए व्यापक तैयारी और सहमति की जरूरत होती है।
फिर भी, एक साल तक कोई ठोस कदम न उठाए जाने से सरकार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आगे क्या होगा?
जातीय जनगणना को लेकर देश में बहस लगातार तेज हो रही है। जहां एक ओर विपक्ष इसे सामाजिक न्याय का अहम मुद्दा बता रहा है, वहीं सरकार की चुप्पी इस विवाद को और गहरा कर रही है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रोडमैप पेश करती है या यह सियासी आरोप-प्रत्यारोप का विषय बना रहेगा।
जातीय जनगणना का मुद्दा केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का भी है। कांग्रेस के आरोपों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। अब सबकी नजर इस पर है कि सरकार कब और कैसे इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है।