‘जमीन खाली करो वरना…’ यूसुफ पठान को हाई कोर्ट की कड़ी फटकार, सरकारी भूखंड कब्जे पर उठाए बड़े सवाल

यूसुफ पठान के लिए बढ़ीं मुश्किलें, सरकारी जमीन विवाद में हाई कोर्ट ने पूछा- कब्जा किस आधार पर किया?

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और तृणमूल कांग्रेस सांसद Yusuf Pathan एक बार फिर कानूनी विवादों के केंद्र में आ गए हैं। वडोदरा स्थित सरकारी जमीन पर कथित कब्जे के मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी अपील पर सुनवाई करते हुए कई सख्त सवाल उठाए हैं।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि जब राज्य सरकार ने भूखंड आवंटन का प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं किया, तब संबंधित जमीन पर कब्जा किस आधार पर किया गया। कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी

गुजरात हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश Sunita Agarwal और न्यायमूर्ति D. N. Ray की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बिना वैध आवंटन और भुगतान के किसी सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करना स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जा पाया जाता है तो संबंधित पक्ष को न केवल जमीन खाली करनी पड़ सकती है, बल्कि हर्जाना भी देना पड़ सकता है।

क्या है पूरा विवाद?

विवाद वडोदरा में स्थित 978 वर्गमीटर सरकारी भूखंड से जुड़ा है, जो यूसुफ पठान के आवास के निकट बताया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, इस जमीन के आवंटन को लेकर एक प्रस्ताव राज्य सरकार के समक्ष भेजा गया था। हालांकि बाद में सरकार ने उस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।

यहीं से विवाद शुरू हुआ। अदालत के समक्ष यह प्रश्न उठा कि जब आवंटन प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और भूखंड के लिए कोई वैधानिक भुगतान भी नहीं किया गया, तब जमीन का उपयोग और कब्जा किस आधार पर किया गया।

कोर्ट ने पूछा- क्या जमीन खाली की गई?

सुनवाई के दौरान अदालत ने यूसुफ पठान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता से सीधा सवाल किया कि क्या संबंधित भूखंड अभी तक खाली किया जा चुका है या नहीं।

पीठ ने यह भी जानना चाहा कि यदि भूमि खाली नहीं की गई है तो उसे खाली करने के लिए कितना समय चाहिए।

अदालत की टिप्पणियों से साफ संकेत मिला कि वह इस मामले को गंभीरता से देख रही है और सार्वजनिक संपत्ति से जुड़े मामलों में किसी तरह की ढिलाई के पक्ष में नहीं है।

अगस्त 2025 के आदेश को दी गई चुनौती

यह मामला उस अपील से जुड़ा है जिसमें यूसुफ पठान ने अगस्त 2025 में एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी है।

एकल पीठ ने अपने आदेश में उन्हें संबंधित सरकारी भूमि पर “अतिक्रमणकारी” बताया था। इसी आदेश के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट की खंडपीठ में अपील दायर की थी।

अब खंडपीठ उसी अपील पर सुनवाई कर रही है और मामले के विभिन्न पहलुओं की जांच कर रही है।

हर्जाने का भी संकेत

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि सरकारी जमीन का उपयोग बिना अधिकार के किया गया है, तो इसके लिए क्षतिपूर्ति या हर्जाना वसूला जा सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक भूमि से जुड़े मामलों में अदालतें अक्सर भूमि के उपयोग की अवधि और उससे हुए संभावित नुकसान को ध्यान में रखकर हर्जाना तय करती हैं।

हालांकि इस मामले में अभी अंतिम निर्णय नहीं आया है और सुनवाई जारी है।

राजनीतिक और कानूनी दोनों नजरों से अहम मामला

यूसुफ पठान वर्तमान में पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट से सांसद हैं। क्रिकेट से राजनीति तक का उनका सफर काफी चर्चित रहा है।

ऐसे में यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विपक्षी दल और राजनीतिक विश्लेषक भी इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं।

हालांकि अभी तक मामले में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है और अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अगली सुनवाई की तारीख तय की है।

15 जून को होगी अगली सुनवाई

गुजरात हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 15 जून को निर्धारित की है।

इस दौरान अदालत यह भी देख सकती है कि विवादित भूमि की वर्तमान स्थिति क्या है और संबंधित पक्ष ने अदालत की टिप्पणियों के बाद कोई कार्रवाई की है या नहीं।

मामले के अंतिम परिणाम पर अब सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

सरकारी जमीन पर कथित कब्जे से जुड़े इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट का रुख फिलहाल काफी सख्त दिखाई दे रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बिना वैधानिक प्रक्रिया और स्वीकृति के सार्वजनिक भूमि पर कब्जा स्वीकार्य नहीं है। अब 15 जून की सुनवाई में इस मामले की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।

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