“ऐसा मंजर जिंदगी में कभी नहीं देखा…” अहमदाबाद विमान हादसे की पहली बरसी पर डॉक्टरों ने सुनाई दिल दहला देने वाली कहानी

अहमदाबाद: देश को झकझोर देने वाले अहमदाबाद विमान हादसे को एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। यह वह त्रासदी थी जिसने न केवल सैकड़ों परिवारों की खुशियां छीन लीं, बल्कि उन डॉक्टरों, नर्सों और राहतकर्मियों के दिलों पर भी गहरे निशान छोड़ दिए, जिन्होंने उस भयावह दिन मौत और जिंदगी के बीच जंग लड़ते लोगों को बचाने की हर संभव कोशिश की थी।

हादसे की पहली बरसी से पहले अहमदाबाद सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश जोशी और फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. धर्मेश पटेल ने उस दिन की भयावहता, चुनौतियों और मानवीय संघर्ष की कहानी साझा की। उनकी बातें बताती हैं कि यह केवल एक विमान दुर्घटना नहीं थी, बल्कि आधुनिक भारत के सबसे बड़े चिकित्सा और राहत अभियानों में से एक थी।

“पहले लगा कहीं आग लगी है, फिर पता चला विमान गिर गया”

डॉ. राकेश जोशी ने बताया कि 12 जून की दोपहर उनके लिए सामान्य दिन की तरह शुरू हुई थी। वह एक जटिल सर्जरी में व्यस्त थे। तभी उनके सुरक्षा अधिकारी का फोन आया। पहले सूचना मिली कि अस्पताल परिसर के पास आग लगी है। लेकिन कुछ सेकंड बाद दोबारा फोन आया और बताया गया कि एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया है।

डॉ. जोशी के अनुसार, अपने पूरे मेडिकल करियर में उन्होंने कभी ऐसी सूचना नहीं सुनी थी। उन्हें तुरंत एहसास हो गया कि बड़ी संख्या में घायल अस्पताल पहुंच सकते हैं और हर सेकंड महत्वपूर्ण होने वाला है।

मिनटों में बनाया गया इमरजेंसी सिस्टम

सूचना मिलते ही अस्पताल प्रशासन सक्रिय हो गया। डॉक्टरों, नर्सों और ट्रॉमा विशेषज्ञों को तत्काल बुलाया गया। सभी उपलब्ध चिकित्सा कर्मियों को ट्रॉमा सेंटर में रिपोर्ट करने के निर्देश दिए गए।

अस्पताल में ‘ट्राइएज सिस्टम’ लागू किया गया, जिसके तहत मरीजों की गंभीरता के आधार पर इलाज की प्राथमिकता तय की गई। यह देखा गया कि किस मरीज को तत्काल ऑपरेशन की आवश्यकता है, किसे आईसीयू में भर्ती करना होगा और किसका उपचार बाद में किया जा सकता है।

साथ ही यह आशंका भी थी कि दुर्घटना स्थल के आसपास रहने वाले स्थानीय लोग और बच्चे भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए बाल रोग विशेषज्ञों और आपातकालीन चिकित्सा टीमों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया।

पहले आए घायल, फिर आने लगे जले हुए शव

डॉ. जोशी बताते हैं कि पहला मरीज अस्पताल पहुंचा तो उसकी हालत बेहद गंभीर थी। वह बुरी तरह झुलस चुका था और उसे तुरंत ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया।

अगले लगभग एक घंटे तक घायल मरीज लगातार अस्पताल पहुंचते रहे। डॉक्टरों को इस बात की उम्मीद थी कि जितने अधिक घायल आएंगे, उतनी अधिक जानें बचाई जा सकेंगी। लेकिन एक घंटे बाद स्थिति अचानक बदल गई।

इसके बाद अस्पताल में जो लोग लाए जाने लगे, वे ज्यादातर बुरी तरह जले हुए शव थे। कई शवों की हालत ऐसी थी कि उनकी पहचान करना लगभग असंभव हो गया था।

डॉ. जोशी कहते हैं कि यही वह दृश्य था जिसने पूरे मेडिकल स्टाफ को अंदर तक झकझोर दिया।

“हमने अपने जीवन में ऐसी त्रासदी नहीं देखी”

अस्पताल प्रशासन के अनुसार यह उनके करियर की सबसे बड़ी आपदा थी। हालात को संभालने के लिए पूरे ऑपरेशन को तीन हिस्सों में बांटा गया—घायलों का उपचार, शवों का प्रबंधन और पीड़ित परिवारों की सहायता।

हर कार्य के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गईं। अस्पताल में लगातार वरिष्ठ अधिकारियों, मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों का दौरा भी जारी रहा। सभी का उद्देश्य एक ही था कि पीड़ित परिवारों को कम से कम अतिरिक्त मानसिक परेशानी झेलनी पड़े।

डीएनए पहचान बनी सबसे बड़ी चुनौती

फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. धर्मेश पटेल ने बताया कि बड़ी संख्या में शव इतने बुरी तरह जल चुके थे कि उनकी पहचान संभव नहीं थी। ऐसे में डीएनए परीक्षण ही एकमात्र भरोसेमंद विकल्प बचा।

प्रत्येक शव से वैज्ञानिक तरीके से नमूने लिए गए। दूसरी ओर मृतकों के परिजनों के रक्त नमूने एकत्र किए गए ताकि डीएनए मिलान किया जा सके।

उन्होंने बताया कि फॉरेंसिक लैब की टीमें लगातार 17 से 18 दिनों तक दिन-रात काम करती रहीं। पहला सफल डीएनए मैच 48 घंटे से भी कम समय में प्राप्त हो गया था।

254 शवों की हुई डीएनए से पहचान

डॉ. पटेल के अनुसार कुल 254 पीड़ितों की पहचान डीएनए तकनीक के माध्यम से की गई, जबकि छह लोगों की पहचान उनके चेहरे और अन्य उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर संभव हुई।

पीड़ित परिवारों को बार-बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, इसके लिए प्रत्येक मृतक की एक विशेष फाइल तैयार की गई। इसमें पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, डीएनए रिपोर्ट, मृत्यु प्रमाण पत्र और व्यक्तिगत सामान से जुड़ी जानकारी शामिल की गई।

हादसे ने बदल दिए अस्पताल के प्रोटोकॉल

इस त्रासदी के बाद अस्पताल प्रशासन ने आपदा प्रबंधन से जुड़े कई नए प्रोटोकॉल तैयार किए हैं। अब भविष्य में किसी भी सामूहिक दुर्घटना की स्थिति में डॉक्टरों, पुलिस, फॉरेंसिक विशेषज्ञों और राहतकर्मियों को एक समन्वित व्यवस्था के तहत तेजी से सक्रिय किया जा सकेगा।

डॉ. जोशी का कहना है कि इस हादसे ने उन्हें सिखाया कि किसी भी आपदा का आकार अनुमान से कहीं बड़ा हो सकता है और ऐसी परिस्थितियों में टीम वर्क ही सबसे बड़ी ताकत साबित होता है।

एक साल बाद भी जिंदा हैं वे यादें

हादसे को एक वर्ष होने के बावजूद उस दिन के दृश्य आज भी डॉक्टरों की स्मृतियों में ताजा हैं। घायलों की चीखें, अपने प्रियजनों को तलाशते परिजन और राहत कार्यों में जुटी सैकड़ों टीमों की भागदौड़ उन्हें आज भी भावुक कर देती है।

डॉक्टरों का कहना है कि इस त्रासदी ने उन्हें मानवीय संवेदनाओं, सेवा और सामूहिक जिम्मेदारी का वास्तविक अर्थ समझाया।

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