पश्चिम एशिया: में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, देश के पास इस समय केवल 25 दिनों का कच्चा तेल (Crude Oil) और रिफाइंड ऑयल का स्टॉक बचा है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब ईरान-इजराइल संघर्ष के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति शृंखला पर दबाव बढ़ रहा है और स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता है और अपनी कुल जरूरत का करीब 85-88% तेल आयात करता है। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।
होर्मुज संकट: क्यों अहम है यह रूट?
ईरान द्वारा Strait of Hormuz को बंद करने की चेतावनी के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम गलियारा माना जाता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
यदि यह मार्ग बंद होता है या यहां सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं, तो एशियाई देशों—खासकर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया—की सप्लाई पर सीधा असर पड़ेगा। विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज में रुकावट से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।
फिलहाल Brent Crude की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी है, जिसमें हाल के दिनों में तेज उछाल देखा गया है।
सरकार की रणनीति: नए सप्लायर्स की तलाश
सरकारी सूत्रों के अनुसार, सरकार ने ऊर्जा मंत्रालय, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों और लॉजिस्टिक एजेंसियों के साथ लगातार समीक्षा बैठकें शुरू कर दी हैं। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री Hardeep Singh Puri ने हाल ही में उच्च स्तरीय बैठक कर कच्चे तेल, LPG और LNG की उपलब्धता की समीक्षा की।
सरकार वैकल्पिक सप्लायर देशों से बातचीत कर रही है ताकि यदि होर्मुज रूट प्रभावित होता है तो आपूर्ति बाधित न हो। रूस, अफ्रीकी देशों और लैटिन अमेरिका के कुछ उत्पादक देशों को संभावित विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर?
आम जनता के लिए राहत की बात यह है कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का कोई तत्काल प्लान नहीं है। सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद सरकार घरेलू कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास कर रही है।
यह संभव है कि तेल विपणन कंपनियां अपने मार्जिन में अस्थायी समायोजन करें ताकि उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ न पड़े। हालांकि यदि वैश्विक कीमतों में लंबी अवधि तक उछाल रहता है, तो भविष्य में मूल्य संशोधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
रूस बना बड़ा विकल्प
तनाव के बीच भारत ने एक बार फिर रूस की ओर रुख किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत समुद्र में मौजूद रूसी तेल टैंकरों से कार्गो खरीदने पर विचार कर रहा है। फिलहाल एशियाई जलक्षेत्र में लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल टैंकरों में भरा हुआ है।
रूस भारत को बेंचमार्क कीमतों से डिस्काउंट पर तेल उपलब्ध कराता रहा है। इससे भारत को सस्ता विकल्प मिलता है और महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। सप्लाई सिक्योरिटी के लिहाज से भी रूस एक स्थिर विकल्प माना जा रहा है, क्योंकि उसकी आपूर्ति होर्मुज रूट पर निर्भर नहीं करती।
दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत रूस से तेल खरीदने में तीसरे स्थान पर रहा। चीन पहले और तुर्किये दूसरे स्थान पर रहे। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से कुछ निजी और सरकारी कंपनियों ने रूस से खरीद में आंशिक कटौती भी की है।

शिपिंग और इंश्योरेंस की बढ़ती लागत
पश्चिम एशिया में तनाव का असर केवल तेल कीमतों तक सीमित नहीं है। शिपिंग रूट बदलने के कारण ट्रांजिट टाइम बढ़ गया है। कई जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई और इंश्योरेंस लागत में वृद्धि हुई है।
सरकार ने निर्यातकों और आयातकों के साथ बैठक कर डॉक्यूमेंटेशन और भुगतान प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर जोर दिया है, ताकि व्यापार प्रभावित न हो।
भारत की ऊर्जा निर्भरता: बड़ी चुनौती
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है। पश्चिम एशिया इस आयात का बड़ा स्रोत है। ऐसे में इस क्षेत्र में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) बनाए हैं, जो आपातकालीन स्थिति में उपयोग किए जा सकते हैं। इसके अलावा, सरकार दीर्घकालिक अनुबंधों और विविधीकृत सप्लाई स्रोतों पर भी काम कर रही है।
क्या हो सकता है आगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान-इजराइल संघर्ष लंबा खिंचता है और होर्मुज रूट प्रभावित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। इससे:
- तेल कीमतों में तेजी
- चालू खाते का घाटा बढ़ने की आशंका
- रुपया पर दबाव
- महंगाई में वृद्धि
जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
हालांकि, भारत की बहु-स्रोत रणनीति, रूस से रियायती तेल और वैकल्पिक सप्लायर तलाशने की नीति कुछ हद तक जोखिम कम कर सकती है।
सिर्फ 25 दिनों का तेल स्टॉक होने की खबर ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता जरूर बढ़ाई है, लेकिन सरकार सक्रिय मोड में है। होर्मुज संकट के बीच वैकल्पिक सप्लायर्स से बातचीत, रूस से बढ़ती खरीद और घरेलू कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश से संकेत मिलता है कि स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है। आने वाले हफ्ते इस बात का फैसला करेंगे कि वैश्विक तनाव अस्थायी है या लंबी अवधि की चुनौती में बदलता है। फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यही है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत नहीं बढ़ेंगी।