“AI से बना सबूत और कोर्ट का फैसला! सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी—न्याय प्रक्रिया से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं”

नई दिल्ली/विजयवाड़ा: न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या AI से तैयार किए गए सबूतों के आधार पर कोर्ट फैसला सुना सकती है? इस गंभीर मुद्दे पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा कि AI जनरेटेड सबूतों पर फैसला लिखना “बिल्कुल गलत” है और इसका सीधा असर न्याय प्रक्रिया की ईमानदारी पर पड़ता है।

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी निर्णय का आधार नकली या अस्तित्वहीन सबूत हों, तो यह सिर्फ एक सामान्य त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर दुराचार (मिसकंडक्ट) माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के नतीजों और जवाबदेही की गहराई से जांच जरूरी है।

मामला क्या है?

दरअसल, अगस्त 2025 में आंध्र प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट ने विवादित संपत्ति के मामले में AI से बनाई गई एक तस्वीर को आधार बनाकर फैसला दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिका Andhra Pradesh High Court में दायर की गई, लेकिन जनवरी 2026 में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद मामला Supreme Court of India पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि यह सिर्फ एक केस का मुद्दा नहीं, बल्कि न्याय देने की पूरी प्रक्रिया से जुड़ा प्रश्न है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर कोई न्यायिक आदेश गैर-मौजूद या नकली सबूतों पर आधारित पाया जाता है, तो यह न्यायिक प्रणाली के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि AI का इस्तेमाल अगर सत्यापन के बिना किया जाए, तो इससे न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा आघात पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में देश के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और Bar Council of India को नोटिस जारी किया है। कोर्ट यह जानना चाहता है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या दिशानिर्देश बनाए जा सकते हैं और जिम्मेदारी किसकी तय होगी।

एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट पर रोक

मामले की सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि ट्रायल कोर्ट ने विवादित प्रॉपर्टी की स्थिति का आकलन करने के लिए एक एडवोकेट-कमिश्नर नियुक्त किया था। याचिकाकर्ताओं ने कमिश्नर की रिपोर्ट पर आपत्ति जताई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) के अंतिम निपटारे तक ट्रायल कोर्ट एडवोकेट-कमिश्नर की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई न करे। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को तय की गई है।

पहले भी जता चुका है कोर्ट चिंता

गौरतलब है कि 17 फरवरी को एक अलग मामले की सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने AI टूल्स की मदद से तैयार की जा रही याचिकाओं पर चिंता व्यक्त की थी। कोर्ट ने कहा था कि बिना उचित जांच-पड़ताल के AI आधारित दस्तावेज दाखिल करना न्याय प्रक्रिया के लिए खतरनाक ट्रेंड बन सकता है।

AI और न्याय: सुविधा या खतरा?

AI तकनीक तेजी से कानूनी क्षेत्र में प्रवेश कर रही है। ड्राफ्टिंग, रिसर्च और डॉक्यूमेंट एनालिसिस में इसका उपयोग बढ़ रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना मानवीय सत्यापन के AI से तैयार सामग्री को प्रमाण मान लेना जोखिम भरा हो सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, AI टूल्स कभी-कभी फर्जी या गढ़ी हुई जानकारी भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसे “हैलुसिनेशन” कहा जाता है। यदि अदालतें ऐसे डेटा पर भरोसा करने लगें, तो न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।

न्याय प्रक्रिया की ईमानदारी पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला सिर्फ एक संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं है। असली चिंता न्याय देने की प्रक्रिया को लेकर है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि AI का उपयोग किया जाए, तो उसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश, जवाबदेही और सत्यापन तंत्र होना अनिवार्य है।

देश की सर्वोच्च अदालत का यह रुख आने वाले समय में AI और कानून के रिश्ते को नई दिशा दे सकता है।

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