Supreme Court का बड़ा अलर्ट! अब पैकेट के सामने ही दिखेगा ‘हेल्दी या अनहेल्दी’ सच – फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग पर सख्त निर्देश

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग पर Supreme Court का सख्त रुख

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग: को लेकर देश में बड़ा बदलाव संभव है। हाल ही में Supreme Court of India ने Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) और केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर “फ्रंट ऑफ पैक वॉर्निंग लेबल” लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाए।

कोर्ट का मानना है कि उपभोक्ताओं को खरीदने से पहले ही यह साफ दिखना चाहिए कि उत्पाद में शुगर, नमक और फैट की मात्रा कितनी है और वह स्वास्थ्य के लिए कितना सुरक्षित या जोखिमभरा है।


फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग क्या है?

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग (FOPL) वह प्रणाली है जिसमें किसी भी पैकेज्ड फूड के सामने वाले हिस्से पर ही प्रमुख न्यूट्रिशनल जानकारी स्पष्ट और आसान तरीके से लिखी जाती है।

इसमें आमतौर पर दिखाया जाता है:

  • शुगर की मात्रा
  • नमक (सोडियम) की मात्रा
  • फैट की मात्रा
  • कैलोरी
  • चेतावनी संकेत (यदि मात्रा अधिक हो)

यह जानकारी मौजूदा न्यूट्रिशन टेबल से अलग होती है, जो पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है।


अभी पैकेट पर न्यूट्रिशन जानकारी कहां होती है?

वर्तमान नियमों के अनुसार, न्यूट्रिशनल वैल्यू आमतौर पर पैकेट के पीछे या किनारे पर एक टेबल के रूप में लिखी होती है। इसमें 100 ग्राम या प्रति सर्विंग के हिसाब से कैलोरी, प्रोटीन, फैट, शुगर और सोडियम की मात्रा दी जाती है।

समस्या यह है कि अधिकांश लोग:

  • पैकेट पलटकर नहीं देखते
  • तकनीकी जानकारी समझ नहीं पाते
  • छोटे अक्षरों को पढ़ना कठिन पाते हैं

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग क्यों जरूरी है?

भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज जैसी समस्याएं बड़ी संख्या में सामने आ रही हैं। इनका एक बड़ा कारण है अत्यधिक प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन।

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग के फायदे:

  • उपभोक्ता को तुरंत चेतावनी
  • हेल्दी विकल्प चुनना आसान
  • बच्चों और युवाओं में जागरूकता
  • अनहेल्दी फूड की खपत में कमी

रंग आधारित चेतावनी प्रणाली कैसे काम करती है?

कई देशों में फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग रंग आधारित होती है:

  • रेड – ज्यादा शुगर/नमक/फैट
  • येलो – मध्यम मात्रा
  • ग्रीन – कम मात्रा

इससे उपभोक्ता एक नजर में समझ सकता है कि कौन सा फूड सीमित मात्रा में लेना चाहिए और कौन सा अपेक्षाकृत सुरक्षित है।


एक्सपर्ट की राय

दिल्ली के श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल कंसल्टेंट (इंटरनल मेडिसिन) डॉ. नरेंद्र कुमार सिंगला के अनुसार, लेबलिंग लोगों को जागरूक बनाती है। यह बीमारियों की गारंटी खत्म नहीं करती, लेकिन उपभोक्ता को सूचित निर्णय लेने में मदद करती है।


पैकेज्ड फूड में सबसे हानिकारक तत्व

  • अधिक शुगर
  • अत्यधिक सोडियम
  • ट्रांस फैट
  • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट
  • आर्टिफिशियल प्रिजर्वेटिव्स

इनका लगातार सेवन मेटाबोलिक सिंड्रोम और हृदय रोग का खतरा बढ़ाता है।


कितनी मात्रा सुरक्षित है?

विशेषज्ञों के अनुसार, पैकेज्ड फूड को नियमित भोजन का हिस्सा नहीं बनाना चाहिए। इसे सीमित मात्रा में और कभी-कभार ही लेना बेहतर है।


हेल्दी विकल्प क्या हैं?

  • ताजे फल
  • हरी सब्जियां
  • साबुत अनाज
  • बिना नमक वाले नट्स
  • घर का बना भोजन

ये विकल्प शरीर को जरूरी फाइबर, विटामिन और मिनरल प्रदान करते हैं और अतिरिक्त शुगर-सोडियम से बचाते हैं।

फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण हेल्थ अलर्ट सिस्टम बन सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद यह व्यवस्था लागू होती है, तो पैकेज्ड फूड खरीदते समय लोगों के पास स्पष्ट और सरल जानकारी होगी।

यह कदम भारत में बढ़ती लाइफस्टाइल बीमारियों पर नियंत्रण की दिशा में एक अहम पहल साबित हो सकता है।

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