भारत क्यों नहीं बना ‘मध्यस्थ’? जयशंकर का पाकिस्तान पर बड़ा हमला, सर्वदलीय बैठक में मचा सियासी घमासान

नई दिल्ली: में संसद परिसर में आयोजित सर्वदलीय बैठक के बाद देश की विदेश नीति और मिडिल ईस्ट संकट को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया। इस बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पाकिस्तान पर तीखा हमला करते हुए कहा कि “भारत पाकिस्तान जैसा दलाल देश नहीं है” और वह किसी अन्य देश की ओर से मध्यस्थता नहीं करता।

यह बयान उस समय आया जब कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने बैठक में सवाल उठाया कि ईरान और अन्य पश्चिम एशियाई देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि भारत इस पूरे मामले में निष्क्रिय दिखाई दे रहा है।

बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की और यह लगभग दो घंटे तक चली। इसमें गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी सहित कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री शामिल हुए।

बैठक के दौरान सरकार ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बावजूद भारत में तेल और गैस की सप्लाई पूरी तरह सामान्य बनी हुई है। सरकार ने भरोसा दिलाया कि कच्चे तेल, एलपीजी और अन्य आवश्यक संसाधनों की कोई कमी नहीं है और देश में आपूर्ति शृंखला मजबूत बनी हुई है।

विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने इस दौरान एक विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें मिडिल ईस्ट की मौजूदा स्थिति, भारत की रणनीति और कूटनीतिक प्रयासों की जानकारी साझा की गई। उन्होंने बताया कि भारत लगातार संबंधित देशों के संपर्क में है और स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि भारत की मजबूत रिफाइनिंग क्षमता के चलते वैश्विक तनाव का असर घरेलू सप्लाई पर नहीं पड़ा है। अब तक चार प्रमुख शिपमेंट देश में पहुंच चुकी हैं और आगे भी सप्लाई जारी रहने की संभावना है। यह भी बताया गया कि ईरान द्वारा पांच दिन बाद सप्लाई रूट फिर से खोलना एक सकारात्मक संकेत है।

हालांकि विपक्ष सरकार के जवाबों से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आया। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि भारत इस वैश्विक संकट में सक्रिय भूमिका निभाने के बजाय चुप्पी साधे हुए है। उन्होंने संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की मांग की।

बैठक में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शामिल नहीं हुए, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने भी इस बैठक से दूरी बनाए रखी। इससे बैठक की राजनीतिक अहमियत और भी बढ़ गई।

इससे एक दिन पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में पश्चिम एशिया के हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यदि अमेरिका और इजराइल की ईरान के साथ जंग जारी रहती है, तो इसके गंभीर वैश्विक परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने इसे आने वाले समय की सबसे बड़ी परीक्षा बताते हुए राज्यों से सहयोग की अपील की थी और “टीम इंडिया” की भावना से काम करने की बात कही थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से “गुटनिरपेक्ष” और संतुलित रही है, जिसमें वह सीधे किसी संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बजाय अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि भारत इस मामले में सावधानीपूर्वक कदम उठा रहा है।

कुल मिलाकर, यह सर्वदलीय बैठक न केवल मिडिल ईस्ट संकट पर भारत की रणनीति को स्पष्ट करती है, बल्कि देश के भीतर राजनीतिक मतभेदों को भी उजागर करती है।

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में बिना आवश्यकता मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभाएगा। सरकार का फोकस देश के हित, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संतुलन बनाए रखने पर है, जबकि विपक्ष चाहता है कि भारत अधिक सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाए।

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