पंजाब: की राजनीति में महाशिवरात्रि के दिन बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और दो बार विधायक रह चुके अरविंद खन्ना ने भारतीय जनता पार्टी छोड़कर शिरोमणि अकाली दल (शिअद) का दामन थाम लिया।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है, जब भाजपा और शिअद के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हैं। ऐसे में खन्ना का पार्टी बदलना भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
सुखबीर बादल ने कराया शामिल
महाशिवरात्रि के दिन शिअद प्रमुख सुखबीर सिंह बादल खुद संगरूर स्थित अरविंद खन्ना के निवास पर पहुंचे। वहीं औपचारिक रूप से उन्हें पार्टी में शामिल कराया गया।
सुखबीर बादल ने इस मौके पर कहा कि अरविंद खन्ना का अनुभव और जनाधार पार्टी को मजबूती देगा।
भाजपा में 2022 में हुए थे शामिल
अरविंद खन्ना जनवरी 2022 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे। वर्तमान में वे पंजाब भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष थे।
वे भाजपा की पंजाब कोर समिति और वित्त समिति के सदस्य भी थे। इससे पहले वे पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव और कोषाध्यक्ष के पद पर कार्य कर चुके हैं।

कांग्रेस से लेकर भाजपा और अब शिअद
अरविंद खन्ना का राजनीतिक सफर कई दलों से होकर गुजरा है।
- वे कांग्रेस की टिकट पर 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
- संगरूर और धूरी विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं।
- 2004 में वे अकाली दल के नेता सुखदेव सिंह ढींडसा से 27,277 मतों से हार गए थे, हालांकि उन्होंने 2,59,551 वोट हासिल किए थे।
अब शिअद में उनकी वापसी को ‘घर वापसी’ के तौर पर देखा जा रहा है।
समाजसेवा से भी पहचान
राजनीति के अलावा अरविंद खन्ना अपनी समाजसेवी संस्था ‘उम्मीद फाउंडेशन’ के जरिए निःशुल्क मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए भी जाने जाते हैं। संगरूर क्षेत्र में उनका मजबूत जनाधार माना जाता है।
सियासी मायने क्या?
पंजाब में भाजपा और शिअद के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। ऐसे में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष का शिअद में जाना कई संकेत दे रहा है:
- क्या गठबंधन की अटकलों के बीच शिअद अपनी जमीन मजबूत कर रही है?
- क्या भाजपा के भीतर असंतोष है?
- क्या 2027 विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं?
इन सवालों पर अब राजनीतिक विश्लेषक नजर बनाए हुए हैं।
अरविंद खन्ना का भाजपा छोड़कर शिरोमणि अकाली दल में शामिल होना पंजाब की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम है। यह कदम भाजपा के लिए झटका और शिअद के लिए मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सियासी बदलाव का असर पंजाब की राजनीति और संभावित गठबंधन समीकरणों पर कितना पड़ता है।