उत्तर प्रदेश: की राजधानी लखनऊ में अंबेडकर जयंती के मौके पर जहां एक ओर सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों की धूम रही, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी और सियासी घटनाक्रम ने माहौल को और गरमा दिया। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच तीखी जुबानी जंग देखने को मिली।
अखिलेश यादव ने दिन की शुरुआत हजरतगंज स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर की। इस दौरान उनके गले में पड़ा नीला गमछा चर्चा का विषय बना रहा, जिसे सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। इसके बाद वे बैसाखी के अवसर पर सदर स्थित गुरुद्वारा भी पहुंचे।
हालांकि, सबसे ज्यादा चर्चा उस वक्त हुई जब अखिलेश यादव ने अचानक अपना काफिला रुकवाया और अंबेडकर जयंती के अवसर पर चल रहे भंडारे में शामिल हो गए। उन्होंने आम लोगों के साथ बैठकर पूड़ी-सब्जी और छोले-चावल खाया। इस दौरान स्थानीय लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला। एक महिला ने उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री’ तक बता दिया।
इस घटनाक्रम के तुरंत बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा पर निशाना साधते हुए तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दल “घड़ियाली आंसू” बहा रहे हैं और सामाजिक न्याय के नाम पर जनता को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने अतीत में दलितों और गरीबों का अपमान किया, वही आज खुद को उनके हितैषी बताने की कोशिश कर रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए समाजवादी पार्टी पर हमला करते हुए कहा कि “स्टेट गेस्ट हाउस कांड” जैसे मामलों ने उनकी असली मानसिकता को उजागर किया है। उन्होंने यह भी कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले दलों ने वास्तव में उनके सिद्धांतों का पालन नहीं किया।
इस बीच, बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अंबेडकर जयंती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी और सोशल मीडिया पर लिखा कि संविधान के मूल सिद्धांतों को लागू करने में सत्ताधारी दल विफल रहे हैं।
प्रयागराज में भाजपा विधायक सिद्धार्थनाथ सिंह ने अंबेडकर प्रतिमा की सफाई कर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने प्रतिमा को नहलाया और आसपास सफाई अभियान चलाया, जिसे भाजपा के ‘सेवा भाव’ से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, दिन के दौरान कुछ अप्रिय घटनाएं भी सामने आईं। लखनऊ के बंथरा इलाके में अंबेडकर प्रतिमा पर माल्यार्पण को लेकर विवाद हो गया, जो हिंसा में बदल गया। वहीं कासगंज में भी रैली के दौरान दो पक्षों के बीच झड़प और पथराव हुआ, जिसमें एक पुलिसकर्मी समेत तीन लोग घायल हो गए।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि अंबेडकर जयंती जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक अवसर भी अब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और बयानबाजी का मंच बनते जा रहे हैं। जहां एक ओर नेता जनता के बीच जाकर जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो गया है।