प्रेग्नेंसी: महिलाओं के जीवन का बेहद खास समय होता है, लेकिन इस दौरान शरीर में होने वाले कई हार्मोनल बदलाव कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ा देते हैं। ऐसी ही एक समस्या है गॉल ब्लैडर स्टोन (पित्ताशय की पथरी), जिसका जोखिम गर्भावस्था के दौरान बढ़ सकता है।
मेडिकल रिसर्च के अनुसार, गर्भावस्था में शरीर में एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर बढ़ने से गॉल ब्लैडर के काम करने के तरीके पर असर पड़ता है। इससे पित्त (बाइल जूस) का प्रवाह धीमा हो जाता है और गॉल ब्लैडर में पथरी बनने की संभावना बढ़ जाती है।
‘द जर्नल ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाले हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलाव महिलाओं में गॉलस्टोन बनने का जोखिम काफी बढ़ा देते हैं। इसलिए इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है।
इस विषय पर विशेषज्ञ डॉ. पंखुड़ी गौतम, सीनियर कंसल्टेंट (ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी), कोकून हॉस्पिटल, जयपुर ने विस्तार से जानकारी दी है।
गॉल ब्लैडर क्या होता है और इसका काम क्या है?
गॉल ब्लैडर शरीर का एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो लिवर के ठीक नीचे स्थित होता है। इसका मुख्य काम लिवर द्वारा बनाए गए बाइल जूस (पित्त) को स्टोर करना होता है।
जब हम खाना खाते हैं, तो गॉल ब्लैडर इस पित्त को रिलीज करता है, जो भोजन को पचाने में मदद करता है। खासकर यह शरीर में मौजूद फैट को तोड़कर उसे ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस तरह गॉल ब्लैडर पाचन तंत्र का एक छोटा लेकिन अहम हिस्सा है।
गॉल ब्लैडर स्टोन क्यों बनते हैं?
कई बार गॉल ब्लैडर में जमा पित्त पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाता। जब यह लंबे समय तक अंदर जमा रहता है, तो इसमें मौजूद कोलेस्ट्रॉल और अन्य पदार्थ मिलकर छोटे-छोटे कण बना लेते हैं।
धीरे-धीरे यही कण सख्त होकर पथरी यानी गॉलस्टोन में बदल जाते हैं।
गॉल ब्लैडर स्टोन बनने के मुख्य कारणों में शामिल हैं:
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पित्त का लंबे समय तक गॉल ब्लैडर में जमा रहना
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बाइल जूस का फ्लो धीमा हो जाना
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शरीर में कोलेस्ट्रॉल का ज्यादा बनना
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गॉल ब्लैडर का पूरी तरह खाली न होना
प्रेग्नेंसी में क्यों बढ़ जाता है गॉलस्टोन का खतरा?
गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो गॉल ब्लैडर की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं।
डॉ. पंखुड़ी गौतम के अनुसार:
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प्रेग्नेंसी में एस्ट्रोजेन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिससे पित्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा हो जाती है।
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प्रोजेस्टेरोन हार्मोन गॉल ब्लैडर की मांसपेशियों को ढीला कर देता है।
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इससे गॉल ब्लैडर से पित्त का बाहर निकलना धीमा हो जाता है।
जब पित्त लंबे समय तक गॉल ब्लैडर में जमा रहता है, तो यह कोलेस्ट्रॉल के साथ मिलकर क्रिस्टल बनाता है। यही क्रिस्टल धीरे-धीरे पथरी का रूप ले लेते हैं।
गॉल ब्लैडर स्टोन के 8 अहम संकेत
कई बार गॉलस्टोन होने पर कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। इसे “साइलेंट गॉलस्टोन” कहा जाता है। लेकिन कई मामलों में इसके स्पष्ट संकेत भी दिखते हैं।
इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए:
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पेट के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द
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दाहिनी तरफ पसलियों के नीचे दर्द
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खाना खाने के बाद पेट में भारीपन
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मिचली या उल्टी आना
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अपच या गैस की समस्या
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पीठ या कंधे में दर्द
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बुखार के साथ पेट दर्द
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त्वचा या आंखों में पीलापन
अगर प्रेग्नेंसी के दौरान इनमें से कोई भी लक्षण लगातार दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
गॉलस्टोन से बचने के तरीके
प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ सावधानियां अपनाकर गॉल ब्लैडर स्टोन के जोखिम को कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
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संतुलित और हेल्दी डाइट लें
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ज्यादा तला-भुना और फैटी फूड से बचें
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पर्याप्त पानी पिएं
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नियमित हल्की एक्सरसाइज करें
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डॉक्टर की सलाह से प्रेग्नेंसी चेकअप करवाते रहें
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वजन को नियंत्रित रखें
ये छोटी-छोटी आदतें गॉल ब्लैडर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती हैं।