ढाका/नई दिल्ली। बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-2 (ICT-2) ने 2024 के जुलाई आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में अवामी लीग के सात वरिष्ठ नेताओं को मौत की सजा सुनाई है। तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता न्यायमूर्ति नजमुल इस्लाम चौधरी ने की। फैसला मंगलवार को सुनाया गया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन सात नेताओं को सजा सुनाई गई है, वे सभी मुकदमे के दौरान अदालत में मौजूद नहीं थे और उन्हें गैरहाजिरी में दोषी ठहराया गया। इससे यह फैसला बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में और महत्वपूर्ण हो गया है।
किन सात नेताओं को सुनाई गई मौत की सजा?
ट्रिब्यूनल के फैसले में अवामी लीग के महासचिव और पूर्व सड़क परिवहन मंत्री ओबैदुल कादेर का नाम प्रमुख है।
इसके अलावा अवामी लीग के संयुक्त महासचिव एएफएम बहाउद्दीन नसीम, पूर्व सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री मोहम्मद अली अराफात, जुबो लीग के अध्यक्ष शेख फजले शम्स परश, महासचिव मैनुल हुसैन खान निखिल, प्रतिबंधित छात्र लीग के अध्यक्ष सद्दाम हुसैन और महासचिव शेख वली आसिफ एनान को भी मौत की सजा सुनाई गई है।
सातों आरोपियों की ओर से सरकार द्वारा नियुक्त बचाव वकीलों ने अदालत में उनका पक्ष रखा था। ट्रिब्यूनल ने जनवरी 2026 में इनके खिलाफ आरोप तय किए थे और फरवरी से सुनवाई शुरू हुई थी।
जुलाई आंदोलन में हिंसा को लेकर क्या आरोप थे?
यह मामला 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ हुए छात्र नेतृत्व वाले आंदोलन से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि इन नेताओं ने आंदोलन को दबाने के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर निर्देश दिए, समर्थकों को लामबंद किया और कथित तौर पर भड़काऊ बयान दिए।
अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया कि अलग-अलग बैठकों में आंदोलन का विरोध करने और हिंसा से जुड़ी योजनाओं पर चर्चा हुई। अभियोजन के मुताबिक, इन गतिविधियों का संबंध प्रदर्शनकारियों के खिलाफ व्यापक हिंसा और अन्य कथित अपराधों से था।
हालांकि, इन आरोपों और फैसले को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि मुकदमा आरोपियों की गैरमौजूदगी में चला और उनके बचाव के लिए राज्य द्वारा नियुक्त वकील अदालत में मौजूद थे।
5 अगस्त 2024 को सत्ता से बाहर हुई थीं शेख हसीना
2024 का जुलाई आंदोलन आखिरकार बांग्लादेश की राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बना। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा और देश से बाहर चली गईं। इसके बाद वह भारत आ गईं और तब से भारत में रह रही हैं।
हसीना के सत्ता से हटने के बाद उनकी पार्टी अवामी लीग के खिलाफ भी कार्रवाई तेज हुई। मई 2025 में बांग्लादेश सरकार ने अवामी लीग और उसके सहयोगी संगठनों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया था। हाल में बांग्लादेश हाई कोर्ट ने इस प्रतिबंध को चुनौती देने वाली एक याचिका भी खारिज की है।
शेख हसीना को भी पहले मिल चुकी है मौत की सजा
सात नेताओं को मौत की सजा सुनाए जाने से पहले शेख हसीना और उनके पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में गैरहाजिरी में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है।
हसीना के मामले में ट्रिब्यूनल ने कथित तौर पर ‘सुपीरियर कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी’ के सिद्धांत का इस्तेमाल किया था। हसीना ने इन आरोपों और कार्रवाई को खारिज किया है। वह फिलहाल भारत में हैं और हाल में उनके बांग्लादेश लौटने की इच्छा को लेकर भी बयान सामने आए हैं।
फैसले पर निष्पक्ष सुनवाई को लेकर सवाल भी
बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल को लेकर मानवाधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों की ओर से पहले भी निष्पक्ष सुनवाई और मौत की सजा से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की रिपोर्ट ने ICT की कार्यप्रणाली में निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया था और मौत की सजा पर रोक लगाने की सिफारिश की थी।
इसलिए सात नेताओं के खिलाफ आया फैसला केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति के लिहाज से ही नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकार के नजरिए से भी अंतरराष्ट्रीय निगाहों में रहेगा।
2024 की हिंसा में बड़ी संख्या में हुई थी मौतें
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के आकलन के अनुसार, 15 जुलाई से 5 अगस्त 2024 के बीच बांग्लादेश में आंदोलन से जुड़ी हिंसा में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। इस घटनाक्रम ने देश की राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।
इसके बाद कई पूर्व मंत्रियों, सांसदों, पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज किए गए। इनमें से कई मामलों की सुनवाई अभी जारी है या शुरुआती चरण में है।
अब आगे क्या होगा?
सातों आरोपी फिलहाल बांग्लादेश से बाहर हैं और फैसले के समय अदालत में मौजूद नहीं थे। ऐसे में मौत की सजा के अमल का सवाल उनके पकड़े जाने या देश में लौटने की स्थिति से जुड़ता है।
उधर, शेख हसीना के भारत में रहने का मुद्दा भी बांग्लादेश और भारत के संबंधों के लिहाज से संवेदनशील बना हुआ है। बांग्लादेश सरकार के कुछ प्रतिनिधि पहले ही उन्हें वापस लाने की इच्छा जता चुके हैं।

