नई दिल्ली: भारत के बड़े शहरों में बढ़ता ट्रैफिक जाम आने वाले समय की सबसे बड़ी परिवहन चुनौतियों में शामिल होता जा रहा है। सड़कें चौड़ी होने के बावजूद वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई प्रमुख शहरों में पीक आवर्स के दौरान लोगों को लंबा समय जाम में बिताना पड़ता है। ऐसे में अब देश के परिवहन सिस्टम को भविष्य की तकनीक से जोड़ने की चर्चा तेज हो गई है। इसी कड़ी में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर ‘फ्लाइंग बस’ का जिक्र किया है।
250 लोग एक साथ हवा में करेंगे सफर?
नितिन गडकरी ने जिस फ्लाइंग बस की बात की है, उसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी संभावित यात्री क्षमता बताई जा रही है। उनके अनुसार ऐसी बस की परिकल्पना है, जिसमें एक बार में करीब 250 लोग सफर कर सकें। इसका उद्देश्य केवल परिवहन के साधन को बदलना नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद ट्रैफिक के दबाव को कम करने के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार करना है।
यानी आने वाले समय में जिस ट्रैफिक को पार करने में सड़क पर घंटों लग सकते हैं, उसके लिए हवा में चलने वाला तेज परिवहन सिस्टम एक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, फिलहाल इसे एक प्रस्तावित भविष्य की परिवहन अवधारणा के रूप में ही समझना चाहिए।
आखिर क्यों पड़ी ‘फ्लाइंग बस’ की जरूरत?
भारत के महानगरों में आबादी और निजी वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ सड़कों पर दबाव भी बढ़ा है। मेट्रो, एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और एलिवेटेड कॉरिडोर जैसे विकल्पों के बावजूद हर इलाके में जमीन पर नया परिवहन ढांचा तैयार करना आसान नहीं है।
इसी समस्या के बीच हवा में चलने वाले या ऊंचाई पर आधारित परिवहन सिस्टम को भविष्य की संभावनाओं के तौर पर देखा जा रहा है। गडकरी का कहना है कि भारत को आधुनिक और उन्नत परिवहन तकनीकों की दिशा में आगे बढ़ना होगा। जुलाई 2026 में भी उन्होंने फ्लाइंग बस के साथ इलेक्ट्रिक मास रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम जैसी भविष्य की परिवहन योजनाओं का उल्लेख किया था।

दिल्ली-मानेसर से बेंगलुरु और पुणे तक चर्चा
फ्लाइंग बस की चर्चा केवल एक शहर तक सीमित नहीं बताई गई है। जुलाई में सामने आई रिपोर्टिंग के मुताबिक, भविष्य की उन्नत सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों को लेकर दिल्ली-मानेसर, बेंगलुरु और पुणे जैसे कॉरिडोर पर अध्ययन की बात सामने आई थी। इसका उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में तेज और आधुनिक सार्वजनिक परिवहन की संभावनाओं को तलाशना है जहां सड़क यातायात पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
हालांकि, इन बातों का मतलब यह नहीं है कि इन सभी जगहों पर फ्लाइंग बस सेवा शुरू हो चुकी है। फिलहाल यह भविष्य की परिवहन तकनीक और उसके संभावित इस्तेमाल से जुड़ी योजना/अध्ययन के स्तर की बात है।
क्या बदल सकती है शहरों की तस्वीर?
अगर भविष्य में इस तरह की तकनीक व्यवहारिक और सुरक्षित तरीके से लागू होती है, तो इसका सबसे बड़ा संभावित फायदा सड़क आधारित ट्रैफिक पर दबाव कम करना हो सकता है। जमीन पर सीमित जगह वाले महानगरों में परिवहन के लिए अलग ऊंचाई वाले कॉरिडोर या हवाई मार्ग का इस्तेमाल यात्रा के समय को कम करने में मदद कर सकता है।
इसके अलावा इलेक्ट्रिक या कम-उत्सर्जन तकनीक से जुड़े मास ट्रांजिट सिस्टम को अपनाने की दिशा में भी चर्चा हो रही है। इससे सार्वजनिक परिवहन को अधिक आधुनिक बनाने और पर्यावरणीय दबाव कम करने की संभावना पर काम किया जा सकता है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल—कब शुरू होगी फ्लाइंग बस?
यहीं इस पूरी योजना का सबसे अहम पहलू सामने आता है। अभी फ्लाइंग बस को लेकर किसी निश्चित शुरुआत की तारीख या देशभर में सेवा शुरू होने का ऐलान नहीं हुआ है। इसलिए इसे फिलहाल भविष्य की परिवहन योजना के रूप में देखना चाहिए, न कि ऐसी सेवा के रूप में जो आम यात्रियों के लिए उपलब्ध हो चुकी है।
भारत में किसी भी नई परिवहन तकनीक को लागू करने से पहले सुरक्षा, तकनीकी व्यवहार्यता, लागत, बुनियादी ढांचा, संचालन और नियामकीय मंजूरियों जैसे कई पहलुओं पर काम करना होगा।
गडकरी का यह बयान इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह भारत के सार्वजनिक परिवहन के उस संभावित भविष्य की ओर इशारा करता है, जहां सिर्फ सड़क, रेल और मेट्रो ही नहीं बल्कि नई तकनीक आधारित सिस्टम भी शहरों की यातायात व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। फिलहाल 250 यात्रियों वाली ‘फ्लाइंग बस’ की कल्पना ने भविष्य के परिवहन को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या आने वाले वर्षों में शहरों का ट्रैफिक जमीन से ऊपर उठकर आसमान की ओर जाएगा?

