बुलंदशहर: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो मुश्किल हालात भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकते। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के मालागढ़ गांव की भारती शर्मा की कहानी इस बात की मिसाल है। बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया, परिवार के सामने आर्थिक चुनौतियां थीं, लेकिन क्रिकेटर बनने का सपना नहीं टूटा। मां बीना देवी ने मेहनत-मजदूरी कर बेटी को आगे बढ़ने का मौका दिया। आज भारती अपनी मेहनत और खेल के दम पर उत्तर प्रदेश की महिला क्रिकेट टीम और रणजी प्रतियोगिता तक पहुंच चुकी हैं।
भारती की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि उस मां के संघर्ष की भी कहानी है जिसने कठिन परिस्थितियों में बेटी के सपनों को प्राथमिकता दी। गांव की पगडंडी से क्रिकेट के मैदान तक पहुंचने का यह सफर उन लड़कियों के लिए प्रेरणा बन रहा है, जो खेल में करियर बनाने का सपना देखती हैं।
मालागढ़ से यमुनापुरम स्टेडियम तक का सफर
भारती शर्मा बुलंदशहर के मालागढ़ गांव की रहने वाली हैं। क्रिकेट में आगे बढ़ने के लिए उन्हें नियमित अभ्यास की जरूरत थी। इसके लिए वह गांव से बुलंदशहर के यमुनापुरम स्टेडियम तक जाती थीं। सीमित संसाधनों के बीच रोजाना अभ्यास करना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी दिनचर्या और मेहनत से इस चुनौती का सामना किया।
भारती के पिता विशेष कुमार शर्मा का निधन उनके बचपन में हो गया था। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां उनकी मां बीना देवी पर आ गईं। परिवार की आर्थिक स्थिति के बावजूद मां ने बेटी के क्रिकेट खेलने के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने मेहनत-मजदूरी करके भारती के प्रशिक्षण और आगे बढ़ने की राह आसान बनाने की कोशिश की।
किसी भी खिलाड़ी के लिए प्रतिभा के साथ नियमित अभ्यास, सही मार्गदर्शन और परिवार का सहयोग जरूरी होता है। भारती के जीवन में इन तीनों का मेल दिखाई देता है। उन्होंने अपने हालात को बहाना बनाने के बजाय मैदान पर मेहनत जारी रखी।
बाएं हाथ की स्पिन गेंदबाज, दाएं हाथ से करती हैं बल्लेबाजी
भारती शर्मा की खासियत उनकी ऑलराउंड क्रिकेट क्षमता है। वह बाएं हाथ से स्पिन गेंदबाजी करती हैं और दाएं हाथ से बल्लेबाजी करती हैं। क्रिकेट में गेंदबाजी और बल्लेबाजी की अलग-अलग भूमिकाओं को समझना तथा दोनों में लगातार सुधार करना मेहनत मांगता है।
भारती ने अपने खेल को निखारने के लिए कोच सुखदेव शर्मा के मार्गदर्शन में अभ्यास किया। कोच के अनुसार, वह अपनी तकनीक को समझने और सुधारने में रुचि रखती हैं। अभ्यास के दौरान पिच की स्थिति, गेंद के टप्पे और कलाई के इस्तेमाल जैसे पहलुओं पर सवाल करना उनके सीखने के तरीके का हिस्सा है।
युवा खिलाड़ियों के लिए यह रवैया महत्वपूर्ण है। केवल निर्देश मानना ही नहीं, बल्कि खेल की बारीकियों को समझना और अपनी गलतियों से सीखना भी खिलाड़ी के विकास में मदद करता है।
रणजी टीम तक पहुंचने का सफर
भारती की क्रिकेट यात्रा किसी एक चयन तक सीमित नहीं रही है। वह अंडर-23 स्तर, चैलेंजर ट्रॉफी और सीनियर महिला टी-20 से जुड़े अवसरों में हिस्सा ले चुकी हैं। वर्ष 2024, 2025 और 2026 में उत्तर प्रदेश की रणजी टीम के लिए उनका चयन होने की जानकारी भी रिपोर्टों में दी गई है।
रणजी जैसे घरेलू क्रिकेट मंच पर जगह बनाना खिलाड़ी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है। यहां अलग-अलग स्तर के खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन के जरिए अपने कौशल को साबित करने का अवसर मिलता है। भारती के लगातार चयन से संकेत मिलता है कि वह प्रदेश की महिला क्रिकेट व्यवस्था में अपनी जगह बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं।
हालांकि, किसी टीम में चयन होना और हर मैच की अंतिम एकादश में खेलना अलग-अलग बातें हैं। भारती की उपलब्धियों को समझते समय इन दोनों के बीच अंतर रखना जरूरी है। उनकी यात्रा का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद क्रिकेट से अपना जुड़ाव बनाए रखा।
मां बीना देवी का संघर्ष बना सबसे बड़ी ताकत
भारती की सफलता के पीछे उनकी मां बीना देवी की भूमिका बेहद अहम रही है। पिता के निधन के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं और बेटी के क्रिकेटर बनने के सपने को टूटने नहीं दिया। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने भारती को अभ्यास जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
खेल में करियर बनाने वाले युवाओं को अक्सर उपकरण, यात्रा, प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में परिवार का सहयोग खिलाड़ी के आत्मविश्वास को मजबूत करता है। भारती के मामले में मां का साथ उनके सफर का महत्वपूर्ण आधार रहा है।
यह कहानी उन परिवारों के लिए भी संदेश देती है जो सीमित संसाधनों के कारण बेटियों को खेलों में आगे बढ़ाने को लेकर असमंजस में रहते हैं। अवसर, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिलने पर लड़कियां भी प्रतिस्पर्धी खेलों में अपनी पहचान बना सकती हैं।
भारती से प्रेरित होकर क्रिकेट की ओर बढ़ रही हैं गांव की बेटियां
भारती की उपलब्धियों का असर उनके गांव और आसपास के क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा है। उनकी कहानी से प्रेरित होकर दूसरी लड़कियां भी क्रिकेट की ओर रुचि दिखा रही हैं। यह बदलाव केवल किसी एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में लड़कियों के लिए खेल के अवसरों को लेकर बदलती सोच का संकेत भी है।
महिला क्रिकेट में आगे बढ़ने के लिए स्थानीय स्तर पर बेहतर मैदान, प्रशिक्षित कोच, खेल सामग्री और प्रतियोगिताओं तक पहुंच जरूरी है। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को लगातार प्रशिक्षण और उचित अवसर मिलें तो वे जिला और राज्य स्तर से आगे भी अपनी जगह बनाने का प्रयास कर सकती हैं।
भारती की यात्रा बताती है कि सफलता का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता। लेकिन निरंतर अभ्यास, परिवार का साथ और सीखते रहने की इच्छा खिलाड़ी को आगे बढ़ने में मदद कर सकती है।

