जलवायु परिवर्तन: अब केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की अर्थव्यवस्था, लोगों की सेहत और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी गहरा असर डाल रहा है। बढ़ते तापमान, लंबी होती गर्मी और लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता ने देश के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। एक ताजा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में सामने आया है कि वर्ष 2025 में अत्यधिक गर्मी के कारण भारत को संभावित कमाई के रूप में करीब 174 अरब डॉलर यानी लगभग 16,541 अरब रुपये का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा बताता है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर अब सीधे लोगों की जेब और देश की आर्थिक गतिविधियों तक पहुंच चुका है।
गर्मी से कामकाज और कमाई पर सीधा असर
लैंसेट काउंटडाउन की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के कारण भारत में काम करने की क्षमता प्रभावित हो रही है। जब तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, तो खुले में काम करने वाले मजदूरों, निर्माण क्षेत्र के कर्मचारियों, किसानों, रेहड़ी-पटरी लगाने वालों और अन्य श्रमिकों के लिए लंबे समय तक काम करना मुश्किल हो जाता है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2025 में गर्मी के कारण काम करने की क्षमता में आई कमी से भारत में संभावित कमाई का नुकसान 174 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले यह नुकसान सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP के लगभग 4.2 प्रतिशत के बराबर बताया गया है। तुलना करें तो वैश्विक स्तर पर यह अनुपात करीब 0.91 प्रतिशत रहा।
इसका अर्थ है कि गर्मी का आर्थिक असर भारत पर दुनिया के औसत के मुकाबले कहीं ज्यादा भारी पड़ रहा है। हालांकि, यह संभावित कमाई का अनुमान है, सरकार के खजाने से खर्च हुई रकम या सीधे नकद नुकसान का आंकड़ा नहीं।
दस साल में 193 अरब काम के घंटे प्रभावित
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016 से 2025 के बीच भारत में गर्मी के कारण हर साल औसतन करीब 193 अरब संभावित कामकाजी घंटे प्रभावित हुए। यह आंकड़ा 1990 के दशक के औसत की तुलना में लगभग 75 प्रतिशत अधिक है।
इसका असर उन लोगों पर सबसे ज्यादा पड़ता है जिनकी रोजी-रोटी शारीरिक मेहनत और बाहर काम करने पर निर्भर है। खेतों में काम करने वाले किसान, मजदूर और निर्माण क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी तेज गर्मी में अपनी सामान्य कार्यक्षमता बनाए नहीं रख पाते। कई बार उन्हें काम के घंटे कम करने पड़ते हैं या दोपहर के समय काम रोकना पड़ता है।
इससे केवल उनकी दैनिक कमाई ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि निर्माण, कृषि और अन्य उत्पादन गतिविधियों की गति भी धीमी हो सकती है।
हीटवेव के आधे दिन जलवायु परिवर्तन से जुड़े
रिपोर्ट में भारत में हीटवेव की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई गई है। वर्ष 2016 से 2025 के दौरान देश में हर साल औसतन 10.6 हीटवेव वाले दिन दर्ज किए गए। इनमें से लगभग 5.3 दिन यानी करीब 50 प्रतिशत दिन सीधे मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जुड़े बताए गए हैं।
इसका मतलब है कि बढ़ते वैश्विक तापमान ने भारत में लोगों के सामने आने वाली अत्यधिक गर्मी की स्थिति को और गंभीर बनाया है। लंबे समय तक गर्मी रहने से शरीर पर दबाव बढ़ता है। बुजुर्गों, बच्चों, पहले से कमजोर स्वास्थ्य वाले लोगों और खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से खतरनाक हो सकती है।

रात की नींद भी हो रही प्रभावित
ग्लोबल वार्मिंग का असर केवल दिन के तापमान तक सीमित नहीं है। रात में भी तापमान अधिक रहने से लोगों को पर्याप्त आराम नहीं मिल पा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारत में लोगों ने गर्म रातों के कारण हर साल औसतन करीब 64 घंटे की नींद गंवाई। जब रात में तापमान कम नहीं होता, तो शरीर को दिनभर की गर्मी से उबरने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। इसका असर थकान, एकाग्रता और रोजमर्रा के कामकाज पर पड़ सकता है।
वायु प्रदूषण से भी भारी आर्थिक और स्वास्थ्य नुकसान
रिपोर्ट में वायु प्रदूषण को भी भारत के लिए बड़ी चुनौती बताया गया है। वर्ष 2023 में भारत में सूक्ष्म कणों यानी PM2.5 से जुड़े वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों का आर्थिक मूल्य करीब 517 अरब डॉलर आंका गया। यह भारत की GDP के लगभग 13.5 प्रतिशत के बराबर बताया गया है।
यहां समझना जरूरी है कि यह रकम प्रदूषण के कारण समय से पहले हुई मौतों और जीवन के खोए वर्षों का आर्थिक मूल्यांकन है। इसे सरकार या आम लोगों द्वारा सीधे खर्च की गई राशि नहीं माना जाना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बाहरी वायु प्रदूषण से जुड़ी मौतों में जीवाश्म ईंधन के जलने की भी बड़ी भूमिका है। वर्ष 2023 में ऐसी मौतों का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा जीवाश्म ईंधन से होने वाले प्रदूषण से जुड़ा बताया गया। कोयला इसका एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी को लेकर भी सवाल
रिपोर्ट ने भारत की ऊर्जा नीतियों और जीवाश्म ईंधन पर दी जाने वाली आर्थिक सहायता की ओर भी ध्यान दिलाया है। वर्ष 2024 में भारत की शुद्ध जीवाश्म ईंधन सब्सिडी करीब 62.3 अरब डॉलर आंकी गई। यह देश के राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च का लगभग 49 प्रतिशत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करते हुए प्रदूषण कम करने और स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को बढ़ावा देने की दिशा में तेजी से काम करना जरूरी है।
वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन को स्वास्थ्य आपातकाल मानने की अपील की
लैंसेट काउंटडाउन की दसवीं वार्षिक रिपोर्ट में 146 विशेषज्ञों ने 54 संकेतकों के आधार पर जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के संबंधों का आकलन किया है। रिपोर्ट तैयार करने में दुनिया के कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है।
रिपोर्ट से जुड़े वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में मान्यता देने की अपील की है। उनका कहना है कि जलवायु नीतियों और वित्तीय योजनाओं में लोगों की सेहत को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
भारत के लिए यह चेतावनी खास मायने रखती है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी खेती, निर्माण और असंगठित क्षेत्रों में काम करती है। इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को अत्यधिक गर्मी से बचाने के लिए बेहतर कार्यस्थल व्यवस्था, पीने के पानी की उपलब्धता, छाया, स्वास्थ्य सेवाओं और समय पर मौसम संबंधी चेतावनी की जरूरत है।
आगे क्या है चुनौती?
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल तापमान पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा। शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने, ऊर्जा के स्वच्छ स्रोत अपनाने, सार्वजनिक परिवहन मजबूत करने, प्रदूषण नियंत्रित करने और गर्मी से बचाव की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है।
भारत के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ बढ़ती ऊर्जा और विकास की जरूरतें हैं, तो दूसरी तरफ गर्मी और प्रदूषण से लोगों की सेहत तथा अर्थव्यवस्था को बचाना है। आने वाले वर्षों में लिए जाने वाले फैसले तय करेंगे कि देश इस संकट का सामना कितनी मजबूती से कर पाता है।

