नई दिल्ली: देश की राजनीति में ‘वोट चोरी’ का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी गठबंधन की ओर से आयोजित प्रतीकात्मक महाभियोग कार्यक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला है। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष की इस कार्रवाई को ‘मॉक संसद’ बताते हुए कहा कि कांग्रेस लोकतांत्रिक संस्थाओं का मजाक बना रही है। इतना ही नहीं, उन्होंने इस राजनीतिक बहस को देश के इतिहास से जोड़ते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर भी वोट चोरी का आरोप लगा दिया।
पात्रा ने दावा किया कि अगर भारत के इतिहास में वोट चोरी की कोई पहली घटना हुई थी, तो वह 1946 में सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू के बीच कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर हुए घटनाक्रम में हुई थी। उनके इस बयान ने पहले से चल रहे राजनीतिक विवाद को और तेज कर दिया है।
‘कांग्रेस की मॉक संसद लोकतंत्र का मजाक’
संबित पात्रा ने 31 अक्टूबर को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विपक्ष के कार्यक्रम पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रतीकात्मक महाभियोग चला रहे हैं, वह संसद जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा के साथ खिलवाड़ है।
पात्रा के मुताबिक, विपक्ष चुनाव आयोग पर सवाल उठाकर और सार्वजनिक मंच पर महाभियोग जैसी प्रक्रिया आयोजित करके राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक नाटक करार दिया।
दरअसल, विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर अपनी आपत्तियां रखीं।
नेहरू और सरदार पटेल का 1946 वाला मामला क्यों उठा?
संबित पात्रा ने अपने बयान में 1946 के कांग्रेस अध्यक्ष पद के चयन का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय सरदार वल्लभभाई पटेल को अधिक समर्थन मिलने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री भी बने।
पात्रा ने इसे वोट चोरी बताते हुए कहा कि सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनने से वंचित किया गया। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के नेताओं ने पटेल के पक्ष में समर्थन दिया था, लेकिन नेहरू को आगे लाया गया।
इस विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझना भी जरूरी है। वर्ष 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद बेहद महत्वपूर्ण हो गया था, क्योंकि उस समय चुना जाने वाला नेता अंतरिम सरकार का नेतृत्व करने की स्थिति में आ सकता था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से 12 ने सरदार पटेल का समर्थन किया था। किसी भी प्रांतीय समिति ने नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था।
हालांकि, महात्मा गांधी की पसंद नेहरू थे। कांग्रेस कार्यसमिति के स्तर पर नेहरू का नाम प्रस्तावित हुआ और बाद में पटेल ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। इसके बाद नेहरू निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। यही घटनाक्रम आज भी राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि 1946 में देश के प्रधानमंत्री पद के लिए आम चुनाव या प्रत्यक्ष मतदान नहीं हुआ था। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष के चयन और अंतरिम सरकार के नेतृत्व को लेकर राजनीतिक निर्णय हुए थे। इसलिए पात्रा का इसे सीधे ‘वोट चोरी’ कहना उनका राजनीतिक आरोप है, कोई स्थापित कानूनी निष्कर्ष नहीं।
SIR पर भी भाजपा ने दिया जवाब
पात्रा ने अपने बयान में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) का भी बचाव किया। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं और इससे लोगों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।
इसके जवाब में पात्रा ने कहा कि कई राज्यों में करीब 13 करोड़ लोगों के नाम अभी अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हुए हैं। उन्होंने इस स्थिति को समझाने के लिए ASDD प्रक्रिया का उल्लेख किया।
पात्रा ने बताया कि ASDD में ‘A’ का अर्थ Absent यानी अनुपस्थित और ‘S’ का अर्थ Shifted यानी स्थायी रूप से स्थानांतरित होना है। उनके अनुसार, बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) मतदाता के पते पर गणना फॉर्म के लिए तीन बार पहुंचता है। यदि व्यक्ति तीनों बार उपलब्ध नहीं होता, तो उसे अनुपस्थित श्रेणी में दर्ज किया जा सकता है। वहीं, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए लोगों को स्थानांतरित श्रेणी में रखा जाता है।
भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाने के लिए सत्यापन जरूरी है। दूसरी ओर, विपक्ष का आरोप है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और इससे वास्तविक मतदाताओं के नाम भी प्रभावित हो सकते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। विपक्ष ने SIR के संदर्भ में 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप लगाया है, जबकि पात्रा ने करीब 13 करोड़ लोगों के नाम अंतिम सूची में अभी शामिल नहीं होने की बात कही। ये दोनों अलग-अलग दावे हैं और इन्हें एक ही आंकड़ा या प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की प्रतीकात्मक कार्रवाई
विपक्षी गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से प्रतीकात्मक महाभियोग कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम पहले 30 अक्टूबर को होना था, लेकिन दिल्ली में बारिश के कारण इसे 31 अक्टूबर के लिए टाल दिया गया।
दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। खरगे ने प्रस्ताव पेश किया, जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने समापन टिप्पणी की।
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और चुनाव आयोग के कामकाज में पक्षपात जैसे आरोप लगाए। विपक्ष की ओर से लगाए गए ये आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि होना अलग विषय है।
यह भी स्पष्ट है कि विपक्ष का यह आयोजन वास्तविक संवैधानिक महाभियोग प्रक्रिया नहीं था। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रस्ताव पारित करने से मुख्य चुनाव आयुक्त पद से नहीं हटते। ऐसे पद पर कार्रवाई के लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।
एक नवंबर की रैली से पहले बढ़ी राजनीतिक गर्मी
इस पूरे विवाद के बीच विपक्ष ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली आयोजित करने की तैयारी की है। विपक्ष का उद्देश्य SIR और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर सरकार तथा चुनाव आयोग के खिलाफ अपना विरोध मजबूत करना है।
भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया का समर्थन कर रही है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है।
एक तरफ विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस पर राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाने का आरोप लगा रही है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में यह विवाद संसद, चुनाव आयोग और राजनीतिक मंचों पर किस दिशा में आगे बढ़ता है।

