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    Home»देश»सुप्रीम कोर्ट में मचा बवाल! CJI को कहे अपशब्द, जजों के सामने उड़ाए कागज; फिर कोर्ट ने जो किया, उसने सबको चौंका दिया
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    सुप्रीम कोर्ट में मचा बवाल! CJI को कहे अपशब्द, जजों के सामने उड़ाए कागज; फिर कोर्ट ने जो किया, उसने सबको चौंका दिया

    Chandra JyotiBy Chandra JyotiJuly 10, 2026No Comments4 Mins Read
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    नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत में शुक्रवार को उस समय असामान्य स्थिति पैदा हो गई, जब एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान कोर्ट की गरिमा को भंग करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया और अदालत के भीतर कागज फेंक दिए। इस घटना से कुछ देर के लिए कोर्टरूम का माहौल तनावपूर्ण हो गया। हालांकि, स्थिति को तुरंत नियंत्रित कर लिया गया और अदालत की कार्यवाही आगे बढ़ी।

    यह घटना सुबह लगभग 11 बजे उस समय हुई जब जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ एक मामले की सुनवाई कर रही थी। संबंधित याचिकाकर्ता स्वयं अपना पक्ष रख रहा था और अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुआ था।

    सुनवाई के दौरान अचानक बिगड़ा माहौल

    जानकारी के अनुसार, सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता ने अदालत से असामान्य तरीके से बातचीत शुरू की। उसने न्यायाधीशों को “न्यायिक सेवक” कहकर संबोधित करते हुए लखनऊ के एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने की मांग की।

    जब पीठ ने उसकी भाषा और व्यवहार पर आपत्ति जताई और पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है, तो याचिकाकर्ता और अधिक उत्तेजित हो गया। इसके बाद उसने कथित रूप से मुख्य न्यायाधीश के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और अपने साथ लाए दस्तावेज हवा में उछाल दिए, जिससे कुछ समय के लिए अदालत की कार्यवाही बाधित हो गई।

    सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत संभाला मोर्चा

    कोर्टरूम में मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए याचिकाकर्ता को बाहर ले गए। उसे कुछ समय के लिए अदालत परिसर में सुरक्षा अधिकारियों की निगरानी में रखा गया ताकि स्थिति पूरी तरह सामान्य हो सके।

    घटना के बाद अदालत की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई और अन्य मामलों की सुनवाई सामान्य रूप से जारी रही।

    अदालत ने दिखाई संवेदनशीलता

    इस पूरे घटनाक्रम का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह रहा कि अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ तत्काल अवमानना या अन्य दंडात्मक कार्रवाई करने का फैसला नहीं किया।

    पीठ ने कहा कि संबंधित व्यक्ति संभवतः अत्यधिक मानसिक तनाव और निराशा में था। अदालत ने माना कि उसका व्यवहार अनुचित था, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।

    पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत के मन में उस व्यक्ति के प्रति केवल सहानुभूति है और वह मामले को आगे बढ़ाकर दंडात्मक कार्रवाई नहीं करना चाहती।

    किस मामले की हो रही थी सुनवाई?

    याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी।

    मामला लखनऊ स्थित स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (कस्टम्स) के एक आदेश से जुड़ा था। मजिस्ट्रेट ने एफआईआर दर्ज कराने के बजाय उसकी अर्जी को निजी शिकायत (Private Complaint) के रूप में स्वीकार किया था।

    इसके खिलाफ याचिकाकर्ता पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि उसके पास वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हैं और उसे उचित मंच पर जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज की याचिका

    सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद पाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

    पीठ ने कहा कि मामले में ऐसा कोई महत्वपूर्ण कारण नहीं है जिसके आधार पर विशेष अनुमति याचिका (SLP) स्वीकार की जाए। इसी के साथ अदालत ने याचिका खारिज कर दी और मामले का निस्तारण कर दिया।

    न्यायपालिका की गरिमा पर फिर उठे सवाल

    सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था में इस प्रकार की घटना ने न्यायालयों की सुरक्षा व्यवस्था और अदालत की गरिमा को लेकर चर्चा तेज कर दी है। हालांकि सुरक्षा कर्मियों ने समय रहते स्थिति संभाल ली, लेकिन इस घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि अदालतों में अनुशासन बनाए रखने के लिए सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

    वहीं दूसरी ओर, अदालत द्वारा दंडात्मक कार्रवाई के बजाय संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने को भी कई कानूनी विशेषज्ञ न्यायपालिका की संतुलित कार्यशैली का उदाहरण मान रहे हैं।

    सुप्रीम कोर्ट में हुई यह घटना असाधारण जरूर रही, लेकिन अदालत ने पूरे मामले में संयम और संवेदनशीलता का परिचय दिया। जहां एक ओर याचिकाकर्ता का व्यवहार अदालत की गरिमा के अनुरूप नहीं था, वहीं दूसरी ओर पीठ ने परिस्थितियों को देखते हुए सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाते हुए अवमानना की कार्रवाई से परहेज किया। साथ ही, कानूनी आधार न मिलने पर याचिका भी खारिज कर दी गई।

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