नई दिल्ली। बच्चों के हितों की रक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि बच्चों की कस्टडी, अभिभावकीय पहुंच (Parental Access) या POCSO (Protection of Children from Sexual Offences Act) से जुड़े मामलों में मनोवैज्ञानिक या मनोरोग मूल्यांकन को नियमित प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी भी बच्चे को बार-बार मनोवैज्ञानिक परीक्षणों और पूछताछ से गुजरने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब परिवारिक विवादों और बाल यौन शोषण से जुड़े मामलों में अदालतें अक्सर बच्चों की मानसिक स्थिति समझने के लिए विशेषज्ञों की मदद लेती हैं। हालांकि अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।
क्या था मामला?
यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञों का एक पैनल गठित करने का निर्देश दिया था। बच्ची कथित रूप से यौन शोषण की पीड़िता भी थी और उसके माता-पिता के बीच कस्टडी को लेकर विवाद चल रहा था।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इसकी सुनवाई की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि किसी बच्चे का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराने की आवश्यकता आखिर क्यों है? क्या इसके बिना अदालत मामले का निष्पक्ष निर्णय नहीं कर सकती?
अदालत ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए किसी बच्चे का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं कराया जा सकता क्योंकि माता-पिता के बीच विवाद चल रहा है। अदालत को पहले यह रिकॉर्ड पर लाना होगा कि परीक्षण क्यों आवश्यक है, उसका उद्देश्य क्या है और उससे क्या निष्कर्ष निकलने की उम्मीद की जा रही है।
पीठ ने कहा कि बच्चे का कल्याण किसी भी न्यायिक प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होना चाहिए। यदि परीक्षण बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है, तो अदालत को वैकल्पिक रास्तों पर विचार करना चाहिए।
बार-बार पूछताछ से बढ़ सकता है मानसिक आघात
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से POCSO मामलों पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यौन शोषण झेल चुके बच्चों को बार-बार घटनाओं को दोहराने, विशेषज्ञों के सामने बयान देने या मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से गुजरने के लिए मजबूर करना एक तरह से उन्हें फिर से मानसिक पीड़ा देने जैसा है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे पहले ही गहरे भावनात्मक आघात से गुजर चुके होते हैं। यदि न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर उन्हें लगातार पूछताछ का सामना करना पड़े, तो यह उनके पुनर्वास में बाधा बन सकता है।
माता-पिता की मानसिक स्थिति भी जांची जाए
फैसले की एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने कहा कि कई कस्टडी विवादों में समस्या बच्चे में नहीं बल्कि माता-पिता के व्यवहार में होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि आवश्यक हो तो सबसे पहले उस अभिभावक की मनोवैज्ञानिक स्थिति का मूल्यांकन कराया जाए जिसके पास वर्तमान में बच्चे की कस्टडी है।
अदालत का मानना है कि कई बार माता-पिता के बीच तनाव, प्रतिशोध की भावना या भावनात्मक अस्थिरता बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। इसलिए केवल बच्चे पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के नए दिशा-निर्देश
फैसले में अदालत ने बच्चों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश भी जारी किए हैं—
- बच्चे का हित और मानसिक सुरक्षा सर्वोपरि होगी।
- मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन नियमित प्रक्रिया नहीं होगा।
- अदालत को परीक्षण की आवश्यकता के स्पष्ट कारण दर्ज करने होंगे।
- न्यूनतम हस्तक्षेप (Minimum Intervention) के सिद्धांत का पालन किया जाएगा।
- बार-बार या बहुस्तरीय परीक्षणों से बचा जाएगा।
- सामान्य परिस्थितियों में केवल एक स्वतंत्र विशेषज्ञ द्वारा मूल्यांकन कराया जाएगा।
- विशेषज्ञों का पैनल केवल असाधारण मामलों में ही गठित किया जाएगा।
- बच्चे की पहचान, रिपोर्ट और थेरेपी रिकॉर्ड पूरी तरह गोपनीय रखे जाएंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बच्चों के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि न्यायिक प्रक्रिया बच्चों के लिए अतिरिक्त बोझ न बने।
सुप्रीम कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है। भविष्य में फैमिली कोर्ट और अन्य न्यायिक संस्थाएं बच्चों से जुड़े मामलों में अधिक सावधानी और संतुलन के साथ निर्णय लेंगी।