नई दिल्ली। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जो आने वाले वर्षों में उसकी आर्थिक ताकत, सामाजिक संरचना और वैश्विक प्रभाव को कमजोर कर सकता है। यह संकट न तो अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध का है और न ही ताइवान विवाद का। चीन की सबसे बड़ी चिंता अब उसकी घटती जन्मदर और युवाओं का शादी से दूर होता रुझान बन गया है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन में “नो मैरिज, नो किड्स” ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। बड़ी संख्या में युवा शादी करने और बच्चे पैदा करने से बच रहे हैं। इसका असर अब सरकारी आंकड़ों में भी साफ दिखाई देने लगा है। वर्ष 2025 की पहली तिमाही में चीन में विवाह पंजीकरण की संख्या पिछले एक दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। इस दौरान 17 लाख से भी कम शादियां दर्ज की गईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो चीन की कार्यशील आबादी तेजी से घटेगी, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लग सकता है।
सरकार कर रही है हर संभव कोशिश
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शी चिनफिंग सरकार ने लोगों को शादी और बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के कई प्रयास शुरू किए हैं। विभिन्न प्रांतों में आर्थिक प्रोत्साहन, विवाह सहायता योजनाएं, मातृत्व लाभ और बच्चों की देखभाल के लिए सब्सिडी दी जा रही है।
सरकार ने तीन साल तक के बच्चों के पालन-पोषण के लिए हर वर्ष हजारों युआन की आर्थिक सहायता देने की योजना भी लागू की है। कई क्षेत्रों में विवाह करने वाले जोड़ों को नकद प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इसके अलावा प्रसूति अवकाश और पारिवारिक छुट्टियों की अवधि भी बढ़ाई गई है।
इतना ही नहीं, विश्वविद्यालयों में विवाह और पारिवारिक जीवन से जुड़े विशेष कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं ताकि युवाओं को परिवार बनाने के लिए प्रेरित किया जा सके।

फिर भी क्यों नहीं बदल रहे हालात?
सरकारी प्रयासों के बावजूद चीन के युवाओं की सोच तेजी से बदल रही है। आधुनिक और शिक्षित युवा अब विवाह को जीवन की अनिवार्यता नहीं मानते। खासकर महिलाओं में यह बदलाव अधिक दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार चीन में शादी के बाद घर और बच्चों की जिम्मेदारी मुख्य रूप से महिलाओं पर आ जाती है। इससे उनके करियर पर असर पड़ता है। कई महिलाएं मानती हैं कि मातृत्व उनके पेशेवर विकास की राह में सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।
यही वजह है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं विवाह और मातृत्व को लेकर पहले की तुलना में अधिक सावधानी से निर्णय ले रही हैं।
वन चाइल्ड पॉलिसी का दिख रहा असर
चीन की वर्तमान जनसंख्या समस्या की जड़ें 1980 में लागू की गई वन चाइल्ड पॉलिसी में भी देखी जाती हैं। उस समय जनसंख्या नियंत्रण के लिए परिवारों को केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति दी गई थी।
हालांकि इस नीति ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित कर दिया, लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं। चीन की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है जबकि युवा कार्यबल लगातार कम होता जा रहा है।
इसके साथ ही लिंगानुपात में असंतुलन भी पैदा हुआ, जिसके कारण विवाह योग्य पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक हो गई।
अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर
कम जन्मदर का सबसे बड़ा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में श्रमिकों की कमी उत्पादन और औद्योगिक विकास को प्रभावित कर सकती है।
एक अनुमान के मुताबिक चीन में एक बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक पालने-पोसने में लाखों युआन का खर्च आता है। महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और बढ़ती आवास लागत भी युवाओं को परिवार बढ़ाने से रोक रही हैं।
अगर आने वाले वर्षों में जन्मदर में सुधार नहीं हुआ तो चीन को सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
सिर्फ चीन नहीं, दुनिया भी जूझ रही है इसी समस्या से
यह समस्या केवल चीन तक सीमित नहीं है। दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में जन्मदर लगातार गिर रही है। भारत सहित कई देशों में भी प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल के करीब या उससे नीचे पहुंच चुकी है।
जनसंख्या विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आर्थिक सहायता देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए लैंगिक समानता, सस्ती आवास व्यवस्था, बेहतर चाइल्ड केयर सुविधाएं और परिवार की जिम्मेदारियों का समान बंटवारा सुनिश्चित करना होगा।
चीन का “नो मैरिज, नो किड्स” ट्रेंड केवल एक सामाजिक बदलाव नहीं बल्कि आने वाले दशकों की आर्थिक और जनसांख्यिकीय चुनौती बन चुका है। शी चिनफिंग सरकार तमाम प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है, लेकिन जब तक सामाजिक सोच और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बंटवारे में बदलाव नहीं होगा, तब तक चीन के लिए इस संकट से बाहर निकलना आसान नहीं होगा।