बगदाद/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर चिंता के दौर से गुजर रहा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में गिने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर अनिश्चितता बढ़ने के बीच इराक और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने वैकल्पिक तेल निर्यात मार्गों पर तेजी से काम शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये योजनाएं सफल होती हैं तो न केवल वैश्विक तेल आपूर्ति को राहत मिलेगी, बल्कि भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को भी ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर मजबूती मिल सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा गलियारों में से एक माना जाता है। खाड़ी क्षेत्र के कई प्रमुख तेल उत्पादक देश इसी मार्ग से दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति करते हैं।
जब भी इस क्षेत्र में सैन्य तनाव या राजनीतिक संकट पैदा होता है, वैश्विक तेल कीमतों में उछाल देखने को मिलता है। यही कारण है कि दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश इस क्षेत्र की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखते हैं।
इराक का बड़ा दांव
रिपोर्टों के अनुसार, इराक अब अपने पारंपरिक दक्षिणी निर्यात मार्गों पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके तहत उत्तरी क्षेत्रों से तुर्की तक तेल पहुंचाने वाली पाइपलाइन नेटवर्क को मजबूत किया जा रहा है।
योजना के अनुसार, किर्कुक और कुर्दिस्तान क्षेत्र के तेल भंडारों से कच्चे तेल को तुर्की के भूमध्यसागरीय बंदरगाह सेहान (Ceyhan) तक पहुंचाया जाएगा। इससे इराक को समुद्री बाधाओं से अलग एक वैकल्पिक निर्यात मार्ग मिल सकेगा।
इराक की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात पर आधारित है। इसलिए किसी भी आपूर्ति बाधा का सीधा असर सरकारी राजस्व और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। इसी कारण बगदाद प्रशासन तेजी से नए निर्यात विकल्प विकसित करने में जुटा हुआ है।

भारत को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इराक लंबे समय से भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है।
यदि इराक वैकल्पिक मार्गों से निर्यात बढ़ाने में सफल होता है तो भारत को स्थिर आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल उपलब्ध होने की संभावना भी बढ़ सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आपूर्ति स्रोतों और मार्गों में विविधता भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यूएई भी तैयार कर रहा नया ऊर्जा कॉरिडोर
केवल इराक ही नहीं, बल्कि यूएई भी अपने तेल निर्यात नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में बड़े निवेश कर रहा है।
अबूधाबी की राष्ट्रीय तेल कंपनी पश्चिमी तेल क्षेत्रों को फुजैरा बंदरगाह से जोड़ने वाली नई पाइपलाइन परियोजना पर काम कर रही है। फुजैरा की भौगोलिक स्थिति इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है क्योंकि यह होर्मुज मार्ग पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि नई पाइपलाइन तैयार होने के बाद यूएई की निर्यात क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है और वह वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।
वैश्विक बाजार पर क्या होगा असर?
यदि इराक और यूएई दोनों अपने वैकल्पिक निर्यात मार्गों को सफलतापूर्वक विकसित कर लेते हैं तो वैश्विक तेल बाजार को स्थिरता मिल सकती है।
ऐसी स्थिति में होर्मुज क्षेत्र में किसी भी अस्थायी व्यवधान का प्रभाव पहले की तुलना में कम हो सकता है। इससे तेल की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक परिस्थितियां बेहद जटिल हैं और किसी भी बड़े सैन्य या राजनीतिक संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
भारत की ऊर्जा रणनीति पर असर
भारत लगातार अपने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाने की नीति पर काम कर रहा है। पश्चिम एशिया के देशों के साथ मजबूत संबंध और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों का विकास भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।
इराक और यूएई की नई योजनाएं भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने में सहायक हो सकती हैं, विशेषकर उस समय जब वैश्विक ऊर्जा बाजार अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच इराक और यूएई वैकल्पिक तेल निर्यात मार्ग विकसित कर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन योजनाओं का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों को भी इसका लाभ मिल सकता है। आने वाले वर्षों में ये परियोजनाएं वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दिशा बदलने वाली साबित हो सकती हैं।