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    नवजातों की ढाल क्यों कमजोर पड़ रही? 6 महीने तक मां का दूध पिलाने की दर में भारी गिरावट, डायरिया के मामले बढ़े

    Chandra JyotiBy Chandra JyotiSeptember 4, 2026No Comments5 Mins Read
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    सहारनपुर। नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य और पोषण को लेकर सहारनपुर से सामने आए आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के 2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक जिले में छह माह तक केवल मां का दूध पीने वाले शिशुओं की दर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह दर 67.4 प्रतिशत से घटकर 21.2 प्रतिशत रह गई।

    यानी पहले जहां बड़ी संख्या में शिशुओं को जीवन के शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध मिल रहा था, वहीं अब यह अनुपात काफी कम हो गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नवजात के जीवन के शुरुआती महीनों में स्तनपान को पोषण के साथ-साथ संक्रमण से बचाव के लिए बेहद अहम माना जाता है।

    दूसरी ओर डायरिया के मामलों में बढ़ोतरी

    स्तनपान की घटती दर के साथ बच्चों में डायरिया के आंकड़े भी चिंता बढ़ा रहे हैं। NFHS-6 के अनुसार इसी अवधि में बच्चों में डायरिया की दर 6.1 प्रतिशत से बढ़कर 15.3 प्रतिशत पहुंच गई।

    हालांकि केवल इन दोनों आंकड़ों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि डायरिया में वृद्धि का एकमात्र कारण स्तनपान में कमी है। बच्चों के स्वास्थ्य पर स्वच्छता, साफ पानी, पोषण, संक्रमण और स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। फिर भी विशेषज्ञ शुरुआती शिशु आहार और संक्रमण से सुरक्षा के बीच संबंध को महत्वपूर्ण मानते हैं।

    जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान में सुधार

    रिपोर्ट में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 26.7 से बढ़कर 37.1 प्रतिशत हुआ है।

    इस तरह इस संकेतक में 10.4 प्रतिशत अंक का सुधार दर्ज हुआ। यानी प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान शुरू कराने को लेकर स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है।

    लेकिन इसके बाद लगातार छह महीने तक केवल मां का दूध देने की स्थिति में बड़ी गिरावट दिखाई देती है। यही अंतर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए विशेष चिंता का विषय है।

    छह महीने तक केवल मां का दूध क्यों जरूरी?

    मां का दूध नवजात शिशु के लिए शुरुआती जीवन में महत्वपूर्ण पोषण उपलब्ध कराता है। इसमें बच्चे की उम्र और जरूरत के अनुरूप पोषक तत्व होते हैं। साथ ही स्तनपान संक्रमण से बचाव में भी मदद करता है।

    जिला महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. इंद्रा सिंह के मुताबिक मां का दूध नवजात के लिए सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। उनके अनुसार यह बच्चे को संक्रमण से बचाने, कुपोषण की रोकथाम और शारीरिक एवं मानसिक विकास की मजबूत नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    कामकाजी महिलाओं के सामने बड़ी चुनौती

    सहारनपुर ऑब्स एवं गायनी सोसायटी की अध्यक्ष डॉ. पूनम त्यागी ने स्तनपान की घटती दर के पीछे कई व्यावहारिक कारण बताए हैं।

    उनके अनुसार निजी क्षेत्र में काम करने वाली कई महिलाओं को प्रसव के बाद पर्याप्त मातृत्व अवकाश नहीं मिल पाता। ऐसे में काम पर जल्दी लौटने की मजबूरी के कारण छह महीने तक केवल स्तनपान जारी रखना मुश्किल हो सकता है। कई मामलों में बच्चे को ऊपर का दूध या अन्य आहार जल्दी शुरू कर दिया जाता है।

    बदलती जीवनशैली और खानपान भी वजह

    विशेषज्ञों के मुताबिक गर्भावस्था और प्रसव के बाद मां का संतुलित खानपान भी महत्वपूर्ण है। बदलती जीवनशैली में अनियमित भोजन, फास्ट फूड और कम पौष्टिक आहार की आदतें मां और बच्चे दोनों के पोषण को प्रभावित कर सकती हैं।

    इसके अलावा प्रसव के तुरंत बाद की परिस्थितियां भी स्तनपान को प्रभावित करती हैं। विशेषकर सिजेरियन डिलीवरी के बाद मां को शुरुआती दिनों में अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ सकती है, जिससे स्तनपान शुरू करने और नियमित रूप से जारी रखने में व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आ सकती हैं।

    टीकाकरण और विटामिन-A के आंकड़ों में भी गिरावट

    NFHS-6 के आंकड़ों में केवल स्तनपान ही नहीं, बल्कि बच्चों से जुड़े कुछ अन्य स्वास्थ्य संकेतकों में भी गिरावट सामने आई है।

    हेपेटाइटिस-B की तीसरी खुराक पाने वाले बच्चों का प्रतिशत 82.7 से घटकर 62.8 प्रतिशत हो गया। वहीं विटामिन-A की खुराक पाने वाले बच्चों का प्रतिशत भी 82.7 से घटकर 65.5 प्रतिशत पहुंच गया।

    ये आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कई स्तरों पर लगातार निगरानी और जागरूकता की आवश्यकता है।

    संस्थागत प्रसव और बीमारी में इलाज को लेकर स्थिति बेहतर

    रिपोर्ट में कुछ क्षेत्रों में सुधार भी दर्ज किया गया है। संस्थागत प्रसव के बाद देखभाल और बीमारी की स्थिति में इलाज कराने की प्रवृत्ति बेहतर हुई है।

    इससे संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के कुछ पहलुओं में सुधार हुआ है, लेकिन नवजात पोषण और शुरुआती छह महीनों के स्तनपान जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अभी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

    अब सबसे बड़ा सवाल: छह महीने तक स्तनपान क्यों नहीं?

    सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराने की दर बढ़ने के बावजूद छह महीने तक केवल मां का दूध देने की दर इतनी नीचे क्यों चली गई?

    विशेषज्ञों के अनुसार इसका जवाब सिर्फ स्वास्थ्य व्यवस्था में तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए परिवार, कार्यस्थल, मातृत्व अवकाश, प्रसव के बाद मां की देखभाल, पोषण और सामाजिक जागरूकता—सभी पहलुओं पर एक साथ काम करना होगा।

    नवजात के शुरुआती छह महीने उसके विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में स्तनपान की घटती दर और बच्चों में बढ़ती डायरिया दर के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग, परिवारों और समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी की तरह देखे जा सकते हैं।

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