झीरम घाटी नक्सली हमला 2013: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में हुए देश के सबसे चर्चित नक्सली हमलों में शामिल झीरम घाटी हमले के मामले में करीब 13 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। जगदलपुर की विशेष एनआईए अदालत ने शनिवार को मामले में बचे सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया। इनमें दो महिलाएं भी शामिल हैं। अब अदालत 16 सितंबर 2026 को दोषियों की सजा की अवधि को लेकर फैसला सुनाएगी।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब झीरम घाटी हमले को हुए लगभग 13 साल बीत चुके हैं। मामले में पहले गिरफ्तार किए गए कुल 11 आरोपियों के खिलाफ लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया चली। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई, जिसके बाद अदालत के सामने 10 आरोपी बचे थे। अब इन सभी को दोषी ठहराया गया है।
फैसला पहले 31 अगस्त को होना था
मामले में दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें 12 अगस्त को पूरी हो गई थीं। इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। पहले फैसला 31 अगस्त को सुनाए जाने की तारीख तय की गई थी, लेकिन बाद में इसमें बदलाव किया गया।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता अरविंद चौधरी के अनुसार, अदालत के फैसले की प्रति अभी उन्हें प्राप्त नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि आदेश की प्रति मिलने के बाद दोषसिद्धि के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करने के आधार और कानूनी दलीलों पर फैसला लिया जाएगा।
इसका मतलब यह है कि मामले में कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दोषियों को अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय समेत सक्षम ऊपरी अदालत में अपील का कानूनी अधिकार रहेगा।
25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुआ था खूनी हमला
झीरम घाटी हमला 25 मई 2013 को हुआ था। उस दिन छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले की दरभा घाटी स्थित झीरम घाटी में माओवादियों ने कांग्रेस की ‘परिवर्तन रैली’ को निशाना बनाते हुए घात लगाकर हमला किया था।
हमला एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुआ था और इसमें कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं सहित सुरक्षाकर्मियों और आम लोगों की जान गई थी। इस हमले में कम से कम 32 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 30 से अधिक लोग घायल हुए थे।
हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और वरिष्ठ नेता एवं पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियां मारी गई थीं।
महेंद्र कर्मा नक्सलवाद के खिलाफ चलाए गए ‘सलवा जुडूम’ आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। यही वजह थी कि झीरम घाटी हमला सिर्फ एक राजनीतिक काफिले पर हमला नहीं माना गया, बल्कि इसे छत्तीसगढ़ की राजनीति और नक्सल विरोधी अभियान के लिए बेहद गंभीर घटना के तौर पर देखा गया।
जांच की जिम्मेदारी एनआईए को सौंपी गई
हमले के बाद शुरुआती तौर पर राज्य पुलिस ने मामला दर्ज किया था। तत्कालीन राज्य सरकार ने घटना के कुछ ही समय बाद जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए को सौंप दी थी। इसके अलावा घटना की जांच के लिए हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का भी गठन किया गया था।
जांच आगे बढ़ने के साथ एनआईए ने बड़ी संख्या में संदिग्धों और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की। एजेंसी की ओर से दर्ज मामले में 40 मुख्य आरोपियों समेत 150 से अधिक लोगों के नाम सामने आए थे। इनमें से 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।

चार्जशीट में कई आरोपी फरार बताए गए
मामले की चार्जशीट में 33 अन्य लोगों को फरार बताया गया था। अधिकारियों के अनुसार, इनमें से कुछ नक्सली बाद के वर्षों में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर चुके हैं और मुख्यधारा में लौट चुके हैं।
अदालत में चली लंबी सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों के आधार पर चली इस सुनवाई के बाद अदालत ने अब बचे हुए सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है।
अब सबकी नजर 16 सितंबर पर
अदालत के दोषसिद्धि वाले फैसले के बाद अब अगली महत्वपूर्ण तारीख 16 सितंबर 2026 है। इसी दिन अदालत यह तय करेगी कि दोषी ठहराए गए 10 आरोपियों को किस अवधि की सजा दी जाए।
हालांकि, दोषसिद्धि के बाद भी आरोपियों के पास ऊपरी अदालत में अपील का विकल्प मौजूद है। ऐसे में 16 सितंबर को सजा सुनाए जाने के बाद मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है।

