BRICS: लगातार विस्तार और आर्थिक ताकत के कारण वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण समूह बनकर उभरा है। भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह अब 11 सदस्य देशों तक पहुंच चुका है। दुनिया की करीब आधी आबादी BRICS देशों में रहती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी इसका हिस्सा काफी बड़ा है।
PPP यानी Purchasing Power Parity के आधार पर BRICS देशों की संयुक्त GDP अब G-7 देशों की अर्थव्यवस्था से आगे निकल चुकी है। यह आंकड़ा निश्चित रूप से BRICS की बढ़ती आर्थिक क्षमता को दिखाता है, लेकिन सिर्फ GDP के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि BRICS ने G-7 को पीछे छोड़ दिया है।
असल मुकाबला केवल अर्थव्यवस्था के आकार का नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव, वित्तीय संस्थानों में हिस्सेदारी, तकनीकी क्षमता, सैन्य शक्ति, कूटनीतिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय नियम तय करने की क्षमता का भी है।
G-7 की पकड़ अभी भी मजबूत
BRICS की आर्थिक ताकत बढ़ी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में G-7 देशों का प्रभाव अब भी काफी मजबूत है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF जैसे संस्थानों में विकसित अर्थव्यवस्थाओं का प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है।
BRICS देश लंबे समय से इन संस्थानों में विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ाने और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार की मांग करते रहे हैं। हालांकि, इस दिशा में बदलाव की रफ्तार अभी भी उतनी तेज नहीं है, जितनी BRICS समर्थक देशों को उम्मीद थी।
यही कारण है कि BRICS की आर्थिक ताकत और उसकी संस्थागत ताकत के बीच अभी भी एक बड़ा अंतर दिखाई देता है।
New Development Bank से मिली नई दिशा
BRICS ने अपनी आर्थिक संस्थागत क्षमता बढ़ाने के लिए New Development Bank (NDB) की स्थापना की। बैंक ने सदस्य देशों में परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, जलापूर्ति और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी है।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS केवल मौजूदा पश्चिमी वित्तीय संस्थानों की आलोचना करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी वैकल्पिक संस्थागत क्षमता भी विकसित करना चाहता है।
इसके अलावा BRICS देशों के बीच व्यापार भी लगातार बढ़ा है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिशें भी हो रही हैं। हालांकि, डॉलर की भूमिका को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

AI से लेकर सेमीकंडक्टर तक बड़ी संभावनाएं
BRICS के सामने सहयोग के कई नए क्षेत्र खुल रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सदस्य देश मिलकर काम कर सकते हैं।
भारत के पास इस क्षेत्र में विशेष भूमिका निभाने का अवसर है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और UPI जैसे मॉडल भारत की तकनीकी क्षमता को दुनिया के सामने पहले ही स्थापित कर चुके हैं।
यदि BRICS इन क्षेत्रों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ाता है तो उसका प्रभाव केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीक में भी दिखाई दे सकता है।
ट्रंप की धमकी से बढ़ी चर्चा
डॉलर के विकल्प और de-dollarisation को लेकर BRICS की चर्चा के बीच अमेरिका की तरफ से कड़ा रुख भी सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप ने डॉलर से अलग होने की कोशिश करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी।
इसके बाद BRICS के भीतर भी यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया कि क्या सदस्य देश वास्तव में डॉलर आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को चुनौती देने के लिए तैयार हैं।
व्यावहारिक स्थिति यह है कि BRICS के कई देश डॉलर को तुरंत हटाने के बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर ज्यादा जोर देते दिखाई देते हैं। इसका अर्थ यह है कि de-dollarisation की राजनीतिक चर्चा और उसकी वास्तविक आर्थिक प्रक्रिया के बीच अभी काफी दूरी है।
सबसे बड़ी कमजोरी—साझा राजनीतिक रुख
BRICS की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक विविधता भी है। इसके सदस्य देशों के राजनीतिक हित, आर्थिक प्राथमिकताएं और विदेश नीति कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं।
सदस्य देश अक्सर संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सम्मान की बात करते हैं, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय संघर्षों की बात आती है तो समूह के भीतर एक समान और स्पष्ट रुख बनाना मुश्किल दिखाई देता है।
यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के संघर्षों तक BRICS का रुख कई बार संतुलित और सावधानीपूर्ण रहा है। यही स्थिति संगठन की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को लेकर सवाल खड़े करती है।
ईरान और होर्मुज का सवाल
पश्चिम एशिया में तनाव के संदर्भ में BRICS के सामने एक और कठिन सवाल खड़ा होता है। यदि ईरान की तरफ से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने जैसी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून के संदर्भ में देखा जाता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका की संभावित नाकेबंदी की वैधता पर भी सवाल उठते हैं।
यही दोहरा मानदंड BRICS के सामने बड़ी चुनौती है। यदि संगठन वास्तव में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात करता है तो उसे अंतरराष्ट्रीय कानून के मामलों में समान और स्पष्ट सिद्धांत अपनाने होंगे।
सिर्फ पश्चिमी शक्तियों की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होगा। BRICS को अपने सदस्य देशों से जुड़े विवादों में भी समान नैतिक और कानूनी मानदंड दिखाने होंगे।
मोदी की अपील कितनी प्रभावी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह बात दोहराते रहे हैं कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है और संघर्ष को जल्द खत्म करने के प्रयास होने चाहिए।
यह दृष्टिकोण मानवीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है। किसी भी युद्ध में हर दिन की देरी का मतलब अतिरिक्त मौतें, विस्थापन और आर्थिक तबाही हो सकता है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या BRICS जैसे मंच इन अपीलों को ठोस कूटनीतिक कार्रवाई में बदल सकते हैं?
यदि सदस्य देश केवल बयान जारी करते हैं और संकट के समाधान के लिए साझा रणनीति नहीं बना पाते, तो संगठन की राजनीतिक प्रभावशीलता सीमित ही रहेगी।
BRICS के सामने असली परीक्षा
BRICS के पास आर्थिक शक्ति, बड़ी आबादी, प्राकृतिक संसाधन और तेजी से बढ़ते बाजार हैं। लेकिन इन्हें वैश्विक प्रभाव में बदलने के लिए मजबूत संस्थागत ढांचा, आपसी विश्वास और साझा रणनीति की जरूरत होगी।
G-7 की ताकत केवल उसके देशों की GDP में नहीं है। दशकों से बनी वित्तीय संस्थाएं, वैश्विक व्यापार व्यवस्था, तकनीकी क्षमता, निवेश नेटवर्क और कूटनीतिक गठजोड़ उसे प्रभावशाली बनाते हैं।
इसलिए BRICS का लक्ष्य सिर्फ G-7 को हटाना नहीं होना चाहिए। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि BRICS वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की आवाज को कितना मजबूत कर पाता है।

