लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सड़कों पर तेजी से बढ़ती ई-रिक्शा की संख्या अब सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। शहरों में जाम, अतिक्रमण और यातायात व्यवस्था प्रभावित होने की शिकायतों के बीच राज्य सरकार ने ई-रिक्शा को नियंत्रित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
यूपी सरकार ने केंद्र सरकार से ई-रिक्शा की बिक्री और पंजीकरण को नियंत्रित करने का कानूनी अधिकार देने की मांग की है। इसके लिए परिवहन विभाग ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को पत्र भेजकर मौजूदा नियमों में संशोधन का अनुरोध किया है।
अगर केंद्र सरकार नियमों में संशोधन करती है तो राज्य सरकार के लिए अलग-अलग शहरों में ई-रिक्शा की संख्या निर्धारित करने और उनके पंजीकरण को नियंत्रित करने का रास्ता खुल सकता है।
हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद तेज हुई कार्रवाई
ई-रिक्शा को लेकर यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई है। लखनऊ में यातायात व्यवस्था से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या और उससे पैदा हो रही समस्याओं पर गंभीर टिप्पणी की थी।
21 अगस्त को न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की पीठ ने सूरज सिंह बिसेन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से प्रभावी कदम उठाने की जरूरत बताई थी।
अदालत की टिप्पणी के बाद परिवहन विभाग ने मामले का अध्ययन करने के लिए एक समिति का गठन किया। समिति को ई-रिक्शा के संचालन और उनकी बढ़ती संख्या से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन कर समाधान के सुझाव देने की जिम्मेदारी दी गई।
पांच सदस्यीय समिति ने दी सिफारिश
हाई कोर्ट के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए परिवहन आयुक्त ने अपर परिवहन आयुक्त राजस्व राजेंद्र कुमार विश्वकर्मा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति गठित की थी।
समिति में राज्य परिवहन प्राधिकरण के अपर सचिव अजय यादव, आरटीओ प्रवर्तन लखनऊ प्रभात पांडेय, परिवहन मुख्यालय के एआरटीओ प्राविधिक कमल जोशी और यात्री मालकर अधिकारी शैहपर किदवई को सदस्य बनाया गया था।
समिति ने अपनी सिफारिशों में ई-रिक्शा के अनियंत्रित संचालन पर प्रभावी कार्रवाई की जरूरत बताई। खास तौर पर अनफिट वाहनों के खिलाफ प्रवर्तन अभियान तेज करने की बात कही गई।
इसके अलावा सबसे अहम सिफारिश यह रही कि राज्य सरकार को ई-रिक्शा के पंजीकरण को नियंत्रित करने और शहरों में इनकी संख्या निर्धारित करने का अधिकार मिलना चाहिए।

केंद्र से नियम बदलने की मांग क्यों?
मौजूदा कानूनी व्यवस्था में राज्य सरकार के पास किसी विशेष श्रेणी के वाहनों की बिक्री या पंजीकरण को पूरी तरह रोकने का स्पष्ट अधिकार नहीं है। यही वजह है कि यूपी सरकार ने सीधे केंद्र सरकार से नियमों में संशोधन की मांग की है।
परिवहन विभाग ने मोटरयान अधिनियम, 1988 की धारा 65 के तहत आवश्यक बदलाव करने का अनुरोध किया है।
राज्य सरकार का उद्देश्य यह है कि ई-रिक्शा की संख्या को स्थानीय जरूरतों और सड़क की क्षमता के हिसाब से नियंत्रित किया जा सके।
यानी जिस शहर में सड़कें सीमित हैं और पहले से यातायात का दबाव अधिक है, वहां ई-रिक्शा की संख्या को उसी हिसाब से निर्धारित करने की व्यवस्था बनाई जा सके।
लखनऊ में सबसे ज्यादा चिंता क्यों?
राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश के कई बड़े शहरों में ई-रिक्शा सार्वजनिक परिवहन का महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। कम दूरी की यात्रा के लिए लोग इनका इस्तेमाल करते हैं और कई इलाकों में ये लोगों को आसानी से उपलब्ध भी हो जाते हैं।
लेकिन दूसरी तरफ इनकी संख्या में लगातार वृद्धि से यातायात प्रबंधन मुश्किल होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
भीड़भाड़ वाले बाजारों, मुख्य सड़कों, चौराहों और संकरी गलियों में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा खड़े होने या चलने से यातायात की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। यही स्थिति कई बार अतिक्रमण और जाम की समस्या को भी बढ़ाती है।
सरकार की चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि ई-रिक्शा रोजगार का साधन भी हैं। ऐसे में इनके खिलाफ किसी भी कार्रवाई में यात्रियों की सुविधा और चालकों की आजीविका के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
अवैध और अनफिट ई-रिक्शा पर भी शिकंजा
सरकार केवल संख्या नियंत्रित करने की दिशा में ही नहीं बढ़ रही है, बल्कि नियमों का पालन नहीं करने वाले ई-रिक्शों पर कार्रवाई की भी तैयारी है।
परिवहन विभाग ने लखनऊ पुलिस आयुक्त को अवैध ई-रिक्शों का संचालन रोकने के लिए कड़ाई से कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
समिति ने भी अनफिट वाहनों के संचालन को रोकने के लिए प्रवर्तन कार्रवाई तेज करने की सिफारिश की है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में बिना जरूरी दस्तावेजों, फिटनेस या अन्य निर्धारित मानकों का पालन किए चल रहे ई-रिक्शों पर कार्रवाई बढ़ सकती है।
क्या पूरे देश में बदल सकते हैं नियम?
यूपी सरकार की यह मांग केवल राज्य तक सीमित असर नहीं रखती। अगर केंद्र सरकार मोटरयान नियमों में ऐसा संशोधन करती है जिससे राज्यों को ई-रिक्शा की संख्या और पंजीकरण को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित करने का अधिकार मिलता है, तो इसका असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है।
देश के कई बड़े शहरों में ई-रिक्शा की संख्या बढ़ने के साथ यातायात प्रबंधन एक चुनौती बन चुका है। ऐसे में राज्यों को अधिक नियामक अधिकार मिलने से स्थानीय प्रशासन को सड़क क्षमता, यातायात दबाव और सार्वजनिक परिवहन की जरूरत के अनुसार नीति बनाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस बदलाव का अंतिम स्वरूप केंद्र सरकार के स्तर पर होने वाले निर्णय और नियमों में किए जाने वाले संशोधन पर निर्भर करेगा।
क्या ई-रिक्शा पर पूरी तरह लगेगा प्रतिबंध?
यहां एक बात स्पष्ट है कि फिलहाल सरकार की ओर से पूरे प्रदेश में ई-रिक्शा पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा नहीं हुई है।
मौजूदा पहल का मुख्य उद्देश्य इनकी संख्या, पंजीकरण और संचालन को नियमन के दायरे में लाना है। इसलिए इसे सीधे ई-रिक्शा बंद करने के फैसले के तौर पर देखना सही नहीं होगा।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि ई-रिक्शा यात्रियों के लिए उपयोगी और चालकों के लिए रोजगार का माध्यम बने रहें, लेकिन उनकी अनियंत्रित संख्या से शहरों की यातायात व्यवस्था भी प्रभावित न हो।
अब केंद्र के फैसले पर टिकी नजर
यूपी परिवहन विभाग की ओर से केंद्र को पत्र भेजे जाने के बाद अब आगे की नजर केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के फैसले पर है।
परिवहन आयुक्त आशुतोष निरंजन के अनुसार हाई कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए केंद्रीय मंत्रालय के सचिव को नियमों में संशोधन के लिए पत्र भेजा गया है।
यदि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर सहमति जताती है तो यूपी समेत अन्य राज्यों के लिए ई-रिक्शा की संख्या और पंजीकरण को लेकर अधिक स्पष्ट नियामक व्यवस्था बनाने का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल इतना तय है कि ई-रिक्शा की बढ़ती संख्या अब सिर्फ यातायात की समस्या नहीं, बल्कि नीति और नियमन का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

