नई दिल्ली। अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को दवाइयों और जांच के साथ-साथ कई तरह के मेडिकल डिवाइस के लिए भी भुगतान करना पड़ता है। लेकिन अगर अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली किसी सामान्य मेडिकल चीज की खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई रकम के बीच कई गुना अंतर हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। महाराष्ट्र में सामने आए एक ऐसे ही मामले ने अस्पतालों में मेडिकल डिवाइस की कीमतों और मरीजों से होने वाली वसूली को लेकर बहस तेज कर दी है।
महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन यानी FDA के कमिश्नर तुकाराम मुंढे ने केंद्र सरकार के संबंधित अधिकारियों के सामने यह मुद्दा उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र FDA के एक मार्केट सर्वे में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल डिवाइस की खरीद कीमत और मरीजों से लिए जाने वाले बिल के बीच बेहद बड़ा अंतर सामने आया है।
कुछ मामलों में यह अंतर 2,841 प्रतिशत तक बताया गया है। मुंढे ने 10 अगस्त को डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स और नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को पत्र भेजकर मामले की समीक्षा और उचित नियामकीय कार्रवाई की मांग की।
₹11.05 की खरीद, मरीज को ₹325 का बिल
इस पूरे मामले का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला उदाहरण IV इन्फ्यूजन सेट का है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, एक सेट को करीब ₹11.05 में खरीदा गया, जबकि मरीज के बिल में उसकी कीमत ₹325 दर्ज की गई।
यानी खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई रकम के बीच बहुत बड़ा अंतर सामने आया।
इसी तरह सर्वे में कैथेटर की कीमतों को लेकर भी बड़ा अंतर सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक, निजी अस्पतालों ने करीब ₹310 MRP वाले कैथेटर को ₹29.41 प्रति पीस की दर से खरीदा।
हालांकि, अलग-अलग अस्पतालों, ब्रांड और सप्लाई चैन के आधार पर कीमतों में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक उदाहरण को पूरे निजी अस्पताल क्षेत्र की सामान्य स्थिति मानना उचित नहीं होगा। लेकिन सर्वे में सामने आए बड़े अंतर ने नियामकीय निगरानी की जरूरत जरूर बढ़ा दी है।
तुकाराम मुंढे ने क्यों उठाया सवाल?
तुकाराम मुंढे ने इस मामले को केवल कीमतों से जुड़ा मुद्दा नहीं माना है। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि यह मरीजों की सुरक्षा और पारदर्शिता से भी जुड़ा मामला है।
अस्पताल में भर्ती मरीज या उनके परिवार के पास अक्सर किसी मेडिकल डिवाइस की वास्तविक खरीद कीमत, सप्लायर की कीमत और अस्पताल द्वारा लगाए गए शुल्क की तुलना करने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं होती।
ऐसे में मरीज के पास अस्पताल द्वारा लगाए गए बिल को स्वीकार करने के अलावा बहुत कम विकल्प बचता है।
मुंढे ने मेडिकल डिवाइस की खरीद लागत और घोषित MRP के बीच अंतर को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश बनाने, मार्जिन की समीक्षा करने और अलग-अलग संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने की जरूरत बताई है।
2,841% तक मार्कअप का दावा
महाराष्ट्र FDA के सर्वे में कुछ मामलों में खरीद कीमत और MRP या मरीज से वसूले गए शुल्क के बीच अंतर 2,841 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही गई है।
यह आंकड़ा सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या मेडिकल डिवाइस के लिए ट्रेड मार्जिन की कोई अधिक स्पष्ट सीमा या निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए।
मुंढे ने केंद्र के संबंधित विभागों से इसी दिशा में विचार करने का आग्रह किया है। प्रस्तावों में कुछ जरूरी मेडिकल डिवाइस कैटेगरी को अधिक व्यवस्थित कीमत निगरानी के तहत लाने और ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने जैसे विकल्प शामिल बताए गए हैं।
NPPA भी कर रहा मामले की जांच
रिपोर्ट के मुताबिक, मामले से परिचित अधिकारियों ने बताया कि NPPA इस बात की जांच कर रहा है कि मेडिकल डिवाइस की सप्लाई चेन में निर्माता और बिचौलिए कितना मार्जिन जोड़ रहे हैं।
अथॉरिटी कंपनियों की फाइलिंग और आंतरिक प्राइस लिस्ट की तुलना महाराष्ट्र के सर्वे में सामने आए आंकड़ों से कर रही है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु के ड्रग-कंट्रोल अधिकारियों से भी इसी तरह की शिकायतें मिलने की बात सामने आई है।
इससे संकेत मिलता है कि मेडिकल डिवाइस की कीमत और मरीजों से होने वाली वसूली का मुद्दा केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं हो सकता।
हर मेडिकल डिवाइस पर एक जैसी कीमत सीमा नहीं
NPPA पहले से ही कुछ दवाओं और मेडिकल डिवाइस की कीमतों को लेकर नियामकीय भूमिका निभाता है। Drug Prices Control Order (DPCO), 2013 के तहत कुछ निर्धारित दवाओं और चुनिंदा मेडिकल डिवाइस के लिए कीमत संबंधी नियंत्रण लागू हैं।
वहीं, कुछ नॉन-शेड्यूल्ड उत्पादों के लिए कीमतों में बढ़ोतरी की निगरानी का अलग प्रावधान है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे उत्पादों के MRP में 12 महीने की अवधि में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि पर नियामकीय प्रावधान लागू हो सकते हैं।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मेडिकल डिवाइस के लिए एक समान अधिकतम बिक्री कीमत पहले से तय है। यही वजह है कि तुकाराम मुंढे के पत्र के बाद मेडिकल डिवाइस की कीमतों और ट्रेड मार्जिन को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई है।
स्टेंट और इम्प्लांट पर पहले भी हुई कार्रवाई
मेडिकल डिवाइस की कीमतों पर सरकार और नियामकों की नजर पहले से रही है। कोरोनरी स्टेंट और घुटने के इम्प्लांट सिस्टम जैसी कुछ श्रेणियों में सीधे कीमत नियंत्रण लागू किया जा चुका है।
कोरोना महामारी के दौरान ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और कुछ सामान्य मेडिकल डिवाइस पर ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने की व्यवस्था भी अपनाई गई थी।
ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या अस्पतालों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले दूसरे मेडिकल डिवाइस के लिए भी ऐसी व्यवस्था को व्यापक बनाया जाना चाहिए।
अस्पतालों की भी अपनी दलील
दूसरी तरफ अस्पताल उद्योग का कहना है कि किसी मेडिकल डिवाइस की खरीद कीमत और मरीज से लिया गया शुल्क हमेशा समान नहीं हो सकता। अस्पतालों को स्टाफ, स्टोरेज, लॉजिस्टिक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, उपकरणों के रखरखाव और मरीजों की सुरक्षा पर भी खर्च करना पड़ता है।
आकाश हेल्थकेयर के एमडी डॉ. आशीष चौधरी ने रिपोर्ट में कहा कि किसी भी नए रेगुलेशन से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़नी चाहिए, लेकिन अस्पतालों को आर्थिक रूप से टिकाऊ रहने और स्वास्थ्य सुविधाओं में निवेश करने की गुंजाइश भी मिलनी चाहिए।
यानी आने वाले समय में सरकार के सामने चुनौती मरीजों को अनावश्यक कीमतों से बचाने के साथ-साथ अस्पतालों की वास्तविक परिचालन लागत को संतुलित करने की भी होगी।
अब आगे क्या होगा?
तुकाराम मुंढे की पहल के बाद अब निगाहें NPPA, डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स और अन्य संबंधित नियामक एजेंसियों की समीक्षा पर टिकी हैं।
अगर जांच में मेडिकल डिवाइस की सप्लाई चेन में असामान्य मार्जिन या मरीजों से अनुचित वसूली के पैटर्न की पुष्टि होती है, तो कीमतों की निगरानी और ट्रेड मार्जिन को लेकर नए नियम या दिशा-निर्देश सामने आ सकते हैं।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि हर अस्पताल या हर मेडिकल डिवाइस पर इसी तरह की कीमत वसूली हो रही है। लेकिन महाराष्ट्र FDA के सर्वे ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि मरीजों को मेडिकल डिवाइस की वास्तविक कीमत और अस्पताल द्वारा वसूले गए शुल्क की जानकारी कितनी पारदर्शी तरीके से मिलनी चाहिए।

