नई दिल्ली: नौकरीपेशा लोगों के लिए बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक से एक बड़ा फैसला सामने आया। सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी EPFO की अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। सरकार के मुताबिक इस बदलाव से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी EPFO के अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा दायरे में आ सकते हैं।
इस फैसले की खास बात यह है कि EPFO की वेतन सीमा में यह बदलाव लंबे अंतराल के बाद किया गया है। सरकार का कहना है कि बढ़ती आय, वेतन स्तर में बदलाव और औपचारिक रोजगार के विस्तार को देखते हुए सीमा में संशोधन जरूरी था।
12 साल बाद बदली EPFO की वेतन सीमा
EPFO की अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा पहले ₹15,000 प्रति माह थी। अब इसे ₹25,000 कर दिया गया है। यानी सीमा में ₹10,000 प्रति माह की बढ़ोतरी हुई है।
सरकार के मुताबिक पिछली बार सितंबर 2014 में इस सीमा को ₹6,500 से बढ़ाकर ₹15,000 किया गया था। इसके बाद करीब 12 साल तक इसमें बदलाव नहीं हुआ। अब नई सीमा के जरिए ज्यादा कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा के औपचारिक ढांचे से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
51 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को क्या फायदा होगा?
इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा जो पहले की वेतन सीमा के कारण अनिवार्य EPFO कवरेज से बाहर रह जाते थे।
नई सीमा लागू होने के बाद 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी अनिवार्य EPFO कवरेज में आने की उम्मीद है। इससे उन्हें EPF के साथ-साथ EPFO से जुड़े सामाजिक सुरक्षा लाभों तक पहुंच मिल सकेगी।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ₹25,000 वेतन सीमा का मतलब यह नहीं है कि हर कर्मचारी को हर स्थिति में समान राशि का PF या पेंशन लाभ मिलेगा। वास्तविक योगदान और लाभ संबंधित नियमों, पात्रता और कर्मचारी के वेतन ढांचे पर निर्भर करेंगे।
PF के साथ पेंशन और बीमा का भी कनेक्शन
EPFO सिर्फ भविष्य निधि बचत तक सीमित नहीं है। इसके सामाजिक सुरक्षा ढांचे में भविष्य निधि, पेंशन और बीमा से जुड़े लाभ शामिल हैं। इसलिए अनिवार्य कवरेज का दायरा बढ़ने से नए कर्मचारियों को लंबे समय में सामाजिक सुरक्षा का एक औपचारिक आधार मिल सकता है।
इसका महत्व खास तौर पर उन कर्मचारियों के लिए है जिनकी नौकरी औपचारिक क्षेत्र में है, लेकिन मौजूदा वेतन सीमा के कारण वे अनिवार्य EPFO कवरेज के दायरे में नहीं आते थे।
सरकार पर कितना बढ़ेगा खर्च?
वेतन सीमा बढ़ाने के साथ सरकार के वित्तीय योगदान पर भी असर पड़ेगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार संशोधित व्यवस्था के तहत वार्षिक सरकारी व्यय करीब ₹11,339 करोड़ अनुमानित है।
यानी सरकार को इस विस्तारित सामाजिक सुरक्षा कवरेज के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन लगाने होंगे। यह खर्च बड़ी संख्या में नए कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करने से जुड़ा है।
सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
सरकार का मुख्य तर्क सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना और औपचारिक रोजगार में शामिल ज्यादा कर्मचारियों को EPFO से जोड़ना है। बीते वर्षों में वेतन स्तर में बदलाव हुआ है और रोजगार बाजार में भी औपचारिक क्षेत्र का विस्तार हुआ है।
ऐसे में 2014 में तय की गई ₹15,000 की सीमा को लंबे समय तक बनाए रखने के बजाय इसे ₹25,000 करना सरकार के अनुसार मौजूदा आर्थिक और रोजगार परिस्थितियों के अनुरूप कवरेज बढ़ाने की दिशा में कदम है।
क्या हर ₹25,000 कमाने वाला कर्मचारी अपने आप EPFO में आएगा?
यहां एक जरूरी बात समझना भी महत्वपूर्ण है। वेतन सीमा बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि केवल कर्मचारी की कुल मासिक सैलरी देखकर हर मामले में EPFO कवरेज तय होगा। EPFO कवरेज संबंधित कानून, संस्थान की पात्रता और लागू नियमों के आधार पर निर्धारित होता है।
इसलिए कर्मचारियों को अपने HR विभाग, वेतन पर्ची और EPFO रिकॉर्ड के आधार पर अपनी व्यक्तिगत स्थिति की पुष्टि करनी चाहिए।
सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से क्यों अहम है फैसला?
EPFO में शामिल होने का मतलब कर्मचारी के लिए सिर्फ वर्तमान वेतन से कटौती नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक औपचारिक सामाजिक सुरक्षा ढांचा भी है। PF बचत रिटायरमेंट के समय आर्थिक सहारा दे सकती है, जबकि EPFO से जुड़े अन्य प्रावधान पेंशन और बीमा सुरक्षा से जुड़े हैं।
सरकार पहले से ही EPFO कवरेज बढ़ाने के लिए विभिन्न कदम उठा रही है। अगस्त 2026 में EPFO ने Employees’ Enrolment Campaign 2026 के जरिए उन पात्र कर्मचारियों को भी EPF दायरे में लाने की पहल की थी जो निर्धारित अवधि में कवरेज से बाहर रह गए थे।

