जयपुर: राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में मेयर और प्रमुख पदों के चुनाव के बाद अब डिप्टी मेयर पदों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को कई नगर निगमों में डिप्टी मेयर के चुनाव होने हैं। मेयर चुनाव के दौरान सामने आए बदले हुए समर्थन समीकरणों के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या वही संख्या और समर्थन डिप्टी मेयर के चुनाव में भी कायम रहेगा या पार्षदों के रुख में बदलाव देखने को मिलेगा।
राजस्थान के सात नगर निगमों में सोमवार को मेयर पद के चुनाव पूरे हुए। उपलब्ध नतीजों के अनुसार भाजपा ने छह नगर निगमों में मेयर पद हासिल किया, जबकि बीकानेर में कांग्रेस का मेयर चुना गया। अब डिप्टी मेयर चुनाव में कई जगह निर्दलीय और बागी पार्षद अहम भूमिका में दिखाई दे सकते हैं।
अजमेर में बदले समीकरणों पर नजर
अजमेर नगर निगम का चुनाव सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले मुकाबलों में है। यहां कांग्रेस के 37, भाजपा के 32 और 11 निर्दलीय पार्षद हैं।
पार्षदों की संख्या के लिहाज से कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन मेयर चुनाव में भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले और उन्होंने मेयर पद हासिल किया। इसका मतलब है कि भाजपा के अपने पार्षदों के अलावा उसे अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन भी मिला।
अब डिप्टी मेयर चुनाव में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मेयर चुनाव के दौरान भाजपा के साथ आए पार्षदों का समर्थन आगे भी बना रहता है या समीकरण बदलते हैं।
पाली में बागी फैक्टर
पाली में भी डिप्टी मेयर चुनाव का गणित दिलचस्प है। यहां कांग्रेस के 29, भाजपा के 21 और 15 निर्दलीय पार्षद हैं।
मेयर चुनाव में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार को केवल तीन वोट मिले, जबकि कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाली राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले। भाजपा की नमिता बुबकिया 33 वोट लेकर मेयर चुनी गईं।
अब डिप्टी मेयर चुनाव में कांग्रेस पार्षदों का रुख और मेयर चुनाव में बागी उम्मीदवार के साथ गए पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यहां पिछले चुनाव की वोटिंग से बने समीकरणों का असर दूसरे प्रमुख पद पर भी दिखाई दे सकता है।

अलवर में निर्दलीयों की भूमिका
अलवर नगर निगम में भाजपा के 28, कांग्रेस के 23 और 13 निर्दलीय पार्षद हैं। मेयर चुनाव में भाजपा को निर्दलीय पार्षदों के साथ एक बसपा पार्षद का समर्थन मिलने की जानकारी सामने आई थी।
मेयर पद का चुनाव पूरा होने के बाद अब डिप्टी मेयर के लिए भी यही सवाल है कि क्या समर्थन का यह समीकरण आगे कायम रहता है। डिप्टी मेयर चुनाव के नतीजे से यह स्पष्ट हो सकता है कि मेयर चुनाव के समय बने गठजोड़ कितने स्थायी रहे।
भरतपुर में सबसे अलग है गणित
भरतपुर में स्थिति दूसरे नगर निगमों से अलग है। यहां 36 निर्दलीय पार्षद हैं, जबकि भाजपा के 20 और कांग्रेस के सात पार्षद हैं।
भाजपा की अनुराधा सिंह मेयर पद पर निर्विरोध चुनी जा चुकी हैं। ऐसे में डिप्टी मेयर चुनाव में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। उपलब्ध संख्या को देखते हुए किसी भी पक्ष के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन निर्णायक हो सकता है।
उदयपुर में भाजपा के पास ज्यादा संख्याबल
उदयपुर में भाजपा के 53 पार्षद हैं और मेयर चुनाव में उसे तीन निर्दलीयों का समर्थन मिला। भाजपा के पारस सिंघवी को मेयर चुनाव में 55 वोट मिले।
इस संख्या के आधार पर डिप्टी मेयर चुनाव में भाजपा के पास पर्याप्त संख्याबल दिखाई देता है। हालांकि डिप्टी मेयर पद के चुनाव में उम्मीदवार और स्थानीय स्तर के राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण होंगे।
बीकानेर में कांग्रेस के सामने समर्थन बनाए रखने की चुनौती
बीकानेर में कांग्रेस ने मेयर चुनाव में 50 वोट हासिल किए और यहां पार्टी के पास पार्षदों का बहुमत भी है। इसलिए डिप्टी मेयर चुनाव में कांग्रेस के सामने अपने मौजूदा संख्याबल और समर्थन को बनाए रखने की चुनौती होगी।
यहां मेयर चुनाव और डिप्टी मेयर चुनाव के बीच समर्थन में किसी बदलाव की स्थिति पर राजनीतिक नजर रहेगी।
सिर्फ सात निगम नहीं, पूरे निकाय चुनाव पर नजर
राजस्थान के मौजूदा नगरीय निकाय चुनाव में अब तक घोषित 301 शीर्ष पदों में भाजपा ने 197, कांग्रेस ने 94, निर्दलीयों ने सात और आम आदमी पार्टी, माकपा तथा आरएलपी ने एक-एक शीर्ष पद हासिल किया है।
वार्ड स्तर पर भाजपा ने 4,182, कांग्रेस ने 3,619 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते हैं। इससे साफ है कि कई निकायों में निर्दलीय पार्षदों की संख्या महत्वपूर्ण है, भले ही शीर्ष पदों में उनकी संख्या सीमित रही हो।
जयपुर, जोधपुर और कोटा का चुनाव बाद में
राजस्थान के सभी बड़े नगर निगमों में डिप्टी मेयर की तस्वीर एक साथ साफ नहीं होगी। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों के मेयर चुनाव 25 सितंबर को निर्धारित हैं और उनके बाद 26 सितंबर को डिप्टी मेयर/उपाध्यक्ष पद के चुनाव का कार्यक्रम है।
इस वजह से राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव का पूरा राजनीतिक गणित अगले कुछ दिनों में और स्पष्ट होगा।

