नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिपरिषद का दो दिवसीय चिंतन शिविर सरकार के कामकाज की समीक्षा और आने वाले वर्षों की प्राथमिकताएं तय करने के लिए आयोजित किया गया। 23 सितंबर से शुरू हुए इस मंथन में शासन व्यवस्था, प्रशासनिक सुधार, सरकारी योजनाओं की प्रभावी डिलीवरी, महिलाओं और युवाओं तक योजनाओं की पहुंच तथा विकसित भारत@2047 के लक्ष्य जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। पहले दिन मंत्रियों को आठ अलग-अलग समूहों में बांटा गया और प्रधानमंत्री मोदी ने प्रत्येक समूह के साथ सीधे संवाद किया।
आठ समूहों में बंटे मंत्री, PM मोदी ने खुद लिया फीडबैक
चिंतन शिविर का तरीका सामान्य कैबिनेट बैठक से अलग रखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक मंत्रियों को आठ समूहों में बांटा गया था और प्रत्येक समूह के लिए अलग टेबल पर चर्चा की व्यवस्था की गई। प्रधानमंत्री मोदी खुद इन सभी आठ समूहों के पास पहुंचे और मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श किया।
इस दौरान मंत्रियों ने अपने-अपने मंत्रालयों के काम, उपलब्धियों, चल रही योजनाओं और भविष्य की प्राथमिकताओं से जुड़े मुद्दों पर प्रस्तुतियां दीं। प्रधानमंत्री ने अलग-अलग विषयों पर मंत्रियों से फीडबैक लिया और आगे की कार्ययोजना को लेकर चर्चा की।
सिर्फ योजनाएं नहीं, उनकी डिलीवरी पर भी फोकस
चिंतन शिविर में सरकार की ओर से केवल नई योजनाएं बनाने के बजाय यह देखने पर जोर रहा कि मौजूदा योजनाओं का लाभ वास्तव में पात्र लोगों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है।
जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री ने मंत्रियों से सरकारी लाभ सभी पात्र लोगों तक पहुंचाने और समाज के लिए काम करने पर जोर दिया। योजनाओं की पहुंच बढ़ाने, प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाने और लोगों को मिलने वाली सेवाओं में सुधार को चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।
इसमें मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल भी महत्वपूर्ण विषय रहा। अलग-अलग विभागों की योजनाओं को एक-दूसरे से जोड़कर काम करने और केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाने पर भी विचार किया गया।

विकसित भारत@2047 का रोडमैप केंद्र में
इस पूरे चिंतन शिविर का एक बड़ा उद्देश्य विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए सरकार की मौजूदा नीतियों और भविष्य की प्राथमिकताओं की समीक्षा करना है।
मंत्रियों ने इस बात पर चर्चा की कि देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के दीर्घकालिक लक्ष्य की दिशा में अलग-अलग मंत्रालय किस तरह योगदान दे सकते हैं। इसके लिए मौजूदा योजनाओं की प्रगति, नीति क्रियान्वयन, बुनियादी ढांचे से जुड़े काम और शासन व्यवस्था में सुधार जैसे विषयों पर मंथन किया गया।
विकसित भारत की यह प्रक्रिया नई नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, 2021 से इस विजन पर अलग-अलग स्तरों पर काम चल रहा है। सचिवों के समूहों के जरिए शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म रोडमैप तैयार करने की प्रक्रिया भी पहले से चलती रही है। अब मौजूदा चिंतन शिविर को उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाली कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
‘जन विश्वास से जन आधार’ समेत कई मुद्दों पर चर्चा
पहले दिन की चर्चा में ‘जन विश्वास से जन आधार’ विषय भी शामिल रहा। इसके अलावा शासन, सुधार, महिलाओं और युवाओं तक कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच और सरकारी सेवाओं की डिलीवरी जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
सरकार के सामने चुनौती केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की गति और अंतिम लाभार्थी तक पहुंच को बेहतर बनाना भी है। इसी वजह से चिंतन शिविर में ग्राउंड लेवल पर योजना के असर और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समीक्षा को महत्व दिया गया।
मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा से क्या निकलेगा?
चिंतन शिविर को सरकार के लिए एक तरह की मिड-टर्म स्टॉकटेकिंग एक्सरसाइज के रूप में भी देखा जा रहा है। इसका मकसद अब तक किए गए कामों का जायजा लेना और अगले चरण की प्राथमिकताएं तय करना है।
इस कवायद में मंत्रालयों और विभागों के साथ कैबिनेट सचिवालय तथा नीति आयोग से मिलने वाले इनपुट को भी शामिल किया जा रहा है। सरकार योजनाओं की प्रगति, नीति लागू करने की प्रक्रिया, समय प्रबंधन, विभागों के बीच समन्वय और जनसेवा की गुणवत्ता जैसे पहलुओं पर ध्यान दे रही है।
कैबिनेट फेरबदल की चर्चा भी क्यों?
मंत्रियों के लगातार प्रदर्शन और कामकाज की समीक्षा को लेकर राजनीतिक हलकों में कैबिनेट फेरबदल की अटकलें भी सामने आई हैं। कुछ रिपोर्टों में इसे संभावित फेरबदल की तैयारी के संदर्भ में देखा गया है। हालांकि, सरकार की ओर से कैबिनेट फेरबदल को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए फिलहाल इसे केवल राजनीतिक अटकल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
आगे भी जारी रहेगा मंथन
पहले दिन की चर्चा करीब साढ़े चार घंटे चली। रिपोर्टों के अनुसार, चिंतन शिविर की कवायद आगे भी जारी रहने वाली है और अलग-अलग विषयों पर अगले दौर की चर्चा 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को होने की बात सामने आई है।
इसका मतलब है कि सरकार आने वाले समय में केवल मौजूदा कामकाज की समीक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि विभिन्न मंत्रालयों की प्राथमिकताओं को लंबे समय के राष्ट्रीय लक्ष्य से जोड़ने पर भी काम कर रही है।

