नई दिल्ली। पितृ पक्ष 2026 को लेकर घर-घर में तैयारियां शुरू हो गई हैं। यह अवधि हिंदू धार्मिक परंपराओं में पूर्वजों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य के लिए विशेष मानी जाती है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं और उनकी आत्मशांति के लिए धार्मिक कर्मकांड करते हैं। पंचांग संबंधी उपलब्ध जानकारियों के अनुसार 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से यह क्रम शुरू हो रहा है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा।
हालांकि अलग-अलग पंचांगों और स्थानों के अनुसार पितृ पक्ष की गणना में एक दिन का अंतर दिखाई दे सकता है। इसलिए किसी विशेष श्राद्ध कर्म के लिए स्थानीय पंचांग और योग्य पुरोहित से तिथि की पुष्टि करना उचित माना जाता है।
पितृ पक्ष में सबसे पहले क्या करें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनकी निर्धारित तिथि पर श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। पिंडदान, जल अर्पण तथा अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य करने की परंपरा है। कई परिवार इस दौरान जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं और ब्राह्मण भोज भी कराते हैं।
श्राद्ध कर्म के दौरान मन, वचन और कर्म से सात्विकता बनाए रखने पर भी जोर दिया जाता है। परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान की भावना रखते हुए धार्मिक कार्य करते हैं।
भोजन में रखें सात्विकता का ध्यान
पितृ पक्ष के दौरान भोजन को लेकर भी कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इस अवधि में सादा और सात्विक भोजन करने की परंपरा बताई जाती है। अधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन करने से बचने की सलाह दी जाती है। कई परिवार इस दौरान प्याज और लहसुन का भी सेवन नहीं करते।
श्राद्ध के दिन भोजन तैयार करते समय विशेष शुद्धता और स्वच्छता का ध्यान रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भोजन का कुछ हिस्सा गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों समेत अन्य जीवों के लिए निकालने की परंपरा को पंचग्रास कहा जाता है।

इन कामों से परहेज करने की मान्यता
पितृ पक्ष को उत्सव या मांगलिक आयोजन के बजाय पूर्वजों के स्मरण और श्रद्धा का समय माना जाता है। इसलिए धार्मिक परंपराओं में इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों और नई शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है। नई खरीदारी को लेकर भी अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में मान्यताएं हैं।
इसी तरह पितृ पक्ष के दौरान बाल और नाखून काटने से बचने की धार्मिक मान्यता भी कई स्थानों पर प्रचलित है। इसे संयम और सादगी से जुड़ी परंपरा के रूप में देखा जाता है।
पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियां
उपलब्ध 2026 कैलेंडर के अनुसार पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर से शुरू होकर प्रतिपदा 27 सितंबर, द्वितीया 28 सितंबर, तृतीया 29 सितंबर और चतुर्थी-पंचमी 30 सितंबर को बताई गई हैं। इसके बाद षष्ठी 1 अक्टूबर, सप्तमी 2 अक्टूबर, अष्टमी 3 अक्टूबर, नवमी 4 अक्टूबर, दशमी 5 अक्टूबर, एकादशी 6 अक्टूबर, द्वादशी 7 अक्टूबर, त्रयोदशी 8 अक्टूबर और चतुर्दशी 9 अक्टूबर को है। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या बताई गई है।
सर्वपितृ अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है।
श्रद्धा और सेवा को माना गया महत्वपूर्ण
पितृ पक्ष का मूल भाव केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता से भी जोड़ा जाता है। इस दौरान जरूरतमंदों की सहायता, भोजन और दान-पुण्य करने की परंपरा भी है।
धार्मिक मान्यताओं में इन नियमों को आस्था और परंपरा के रूप में देखा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इनके पालन की विधि अलग हो सकती है, इसलिए किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए स्थानीय परंपरा और पंचांग को प्राथमिकता देना बेहतर है।

