नई दिल्ली: भारत में पानी के संकट और प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर एक अहम तस्वीर सामने आई है। देश में पहली बार बड़े स्तर पर किए जा रहे झरना सर्वेक्षण के दूसरे हिस्से में 10 राज्यों के भीतर कुल 14,468 झरनों की पहचान की गई है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि देश की करीब 15 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 20 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से झरनों के पानी पर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं।
जल शक्ति मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि इन प्राकृतिक जलस्रोतों की स्थिति को समझना और उन्हें संरक्षित करना जल सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में झरनों की पहचान के साथ-साथ उन जलस्रोतों को भी चिह्नित करने पर जोर दिया गया है, जो कमजोर स्थिति में हैं या जिनके सूखने का खतरा बढ़ रहा है।
10 राज्यों में कहां मिले कितने झरने?
सर्वेक्षण में शामिल राज्यों में झरनों की संख्या एक जैसी नहीं है। मणिपुर में सबसे ज्यादा 3,941 झरने दर्ज किए गए हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 3,652, ओडिशा में 1,957, पश्चिम बंगाल में 1,686, गोवा में 1,196 और त्रिपुरा में 1,049 झरनों की पहचान हुई है।
इसके अलावा असम में 792, तेलंगाना में 148, आंध्र प्रदेश में 34 और राजस्थान में 13 झरने दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि प्राकृतिक जलस्रोत केवल हिमालयी क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
महाराष्ट्र और मणिपुर के आंकड़े क्यों चौंकाते हैं?
महाराष्ट्र में दर्ज 3,652 झरनों में 2,629 स्थायी, 909 मौसमी और 114 सूख चुके झरने शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से 265 झरनों यानी करीब 7.6 प्रतिशत पर खतरा मंडरा रहा है।
मणिपुर में स्थिति और महत्वपूर्ण दिखाई देती है। यहां 3,941 झरनों में 3,419 बारहमासी, 457 मौसमी और 65 सूख चुके झरने पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 1,336 झरने खतरे का सामना कर रहे हैं।

ओडिशा में भी बड़ी संख्या में जलस्रोत खतरे में
ओडिशा में सर्वेक्षण के दौरान कुल 1,957 झरने मिले। इनमें 1,568 बारहमासी, 315 मौसमी और 74 ऐसे झरने हैं जो सूख चुके हैं। इनमें से 295 झरने यानी करीब 15.7 प्रतिशत खतरे में बताए गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक ओडिशा के लगभग 99 प्रतिशत झरने ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं। ऐसे में इन जलस्रोतों की स्थिति का सीधा संबंध ग्रामीण आबादी की पानी की उपलब्धता से जुड़ सकता है।
दार्जिलिंग और आदिवासी क्षेत्रों के लिए बेहद अहम
पश्चिम बंगाल में 1,686 झरने दर्ज किए गए हैं। इनमें से बड़ी संख्या दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों में है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले दार्जिलिंग में करीब 1,200 झरने, जबकि कलिम्पोंग में 427 झरने दर्ज किए गए।
इन क्षेत्रों में कई ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए झरने पीने के पानी का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ऐसे में किसी झरने का कमजोर होना या सूख जाना स्थानीय लोगों के लिए सीधे पानी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।
सिर्फ गिनती नहीं, अब संरक्षण की चुनौती
झरनों की गिनती का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार झरने प्राकृतिक भूजल निकास बिंदु हैं और पर्वतीय क्षेत्रों में पीने के पानी, घरेलू जरूरतों और आजीविका के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रिपोर्ट में कमजोर और गंभीर स्थिति वाले झरनों की व्यवस्थित मैपिंग, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के दौरान इनके संरक्षण और Springshed Management के लिए विस्तृत योजनाएं तैयार करने की जरूरत बताई गई है।
20 करोड़ लोगों की निर्भरता, इसलिए बढ़ी चिंता
नीति आयोग के 2018 के आकलन के अनुसार करीब 20 करोड़ भारतीय झरनों के पानी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं, जो देश की आबादी का लगभग 15 प्रतिशत है। यह निर्भरता हिमालय, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में अधिक महत्वपूर्ण है।
नीति आयोग ने यह भी बताया है कि पर्यावरणीय क्षरण, बदलते मौसम, शहरीकरण और अन्य कारणों से कई पर्वतीय क्षेत्रों में झरनों का प्रवाह घट रहा है या वे सूख रहे हैं। इसलिए झरनों को बचाना केवल स्थानीय जलस्रोतों को बचाने का मामला नहीं, बल्कि व्यापक जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन से भी जुड़ा विषय है।
अब आगे क्या होगा?
14,468 झरनों की पहचान के बाद अगली बड़ी चुनौती इन जलस्रोतों को लंबे समय तक जीवित रखना है। इसके लिए उनके आसपास के जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान, भूजल रिचार्ज, जंगल और भूमि संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सरकारी Spring Census से जुड़े दस्तावेज भी झरनों और उनके आसपास के springshed के वैज्ञानिक तरीके से मानचित्रण और प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
इस सर्वेक्षण ने देश के सामने पानी से जुड़ी एक ऐसी तस्वीर रखी है, जिस पर अब गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। हजारों झरनों की पहचान एक महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन असली चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि आने वाले वर्षों में ये प्राकृतिक जलस्रोत सूखने के बजाय लोगों की प्यास बुझाते रहें।

