मुंबई/पणजी। देश में मतदाता सूची को लेकर चल रही Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने खास तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि अगर SIR की प्रक्रिया के दौरान पात्र भारतीय नागरिकों के नाम ही वोटर लिस्ट से बाहर हो जाएं, तो आखिर इस पूरी कवायद का उद्देश्य क्या रह जाता है? अदालत की यह टिप्पणी ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें एक परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मुद्दा उठा था।
अदालत ने पूछा- नागरिक बाहर हुए तो SIR का मकसद क्या?
बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग को उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी की याद दिलाई। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि पात्र भारतीय नागरिक अंतिम मतदाता सूची में शामिल रहें।
अदालत का सवाल बेहद अहम था—अगर SIR के जरिए ऐसे नागरिक ही सूची से बाहर हो जाते हैं, जो वास्तव में पात्र मतदाता हैं, तो फिर इस प्रक्रिया का उद्देश्य क्या रह जाता है?
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया का मकसद पात्र मतदाताओं को बाहर करना नहीं हो सकता। SIR में जहां एक तरफ यह सुनिश्चित करना है कि सूची में केवल पात्र नागरिक रहें, वहीं दूसरी तरफ किसी योग्य मतदाता का नाम अनजाने में हट न जाए, इसकी भी व्यवस्था जरूरी है।
एक परिवार के नाम हटने से उठा पूरा विवाद
मामला गोवा के एक परिवार से जुड़ा है। याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का मुद्दा अदालत के सामने आया।
परिवार की ओर से बताया गया कि उन्होंने अपने पते में बदलाव के लिए Form 8 का इस्तेमाल किया था। Form 8 का इस्तेमाल पहले से पंजीकृत मतदाता द्वारा पता बदलने या मतदाता सूची में मौजूद जानकारी को अपडेट करने के लिए किया जाता है।
लेकिन SIR प्रक्रिया के दौरान उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर हो गए। इसके बाद यह सवाल खड़ा हुआ कि जब कोई व्यक्ति पहले से मतदाता है और केवल अपना पता बदल रहा है, तो उसे नए मतदाता की तरह दोबारा पंजीकरण की प्रक्रिया में क्यों जाना पड़े?

Form 8 और Form 6 को लेकर कोर्ट की आपत्ति
सुनवाई के दौरान Form 8 और Form 6 को लेकर भी महत्वपूर्ण बहस हुई।
Form 8 मौजूदा मतदाता की जानकारी में बदलाव या पते के परिवर्तन से जुड़ा है, जबकि Form 6 नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
अदालत ने सवाल उठाया कि अगर कोई व्यक्ति पहले से मतदाता है और उसने सिर्फ अपना निवास स्थान बदला है, तो उसे नए मतदाता के रूप में Form 6 दाखिल करने के लिए कहना उचित कैसे माना जा सकता है?
पीठ ने इस स्थिति को एक तरह के “Catch-22” यानी ऐसी उलझन बताया, जिसमें व्यक्ति किसी भी विकल्प को अपनाए तो उसके सामने नई समस्या खड़ी हो सकती है।
‘मौजूदा वोटर लिस्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता’
अदालत ने Registration of Electors Rules, 1960 के Rule 21 का भी संदर्भ दिया। पीठ ने कहा कि जब तक नई ड्राफ्ट सूची अंतिम रूप से तैयार नहीं हो जाती, तब तक मौजूदा मतदाता सूची को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत की चिंता यह थी कि अगर किसी व्यक्ति का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है और उसी आधार पर उसे मौजूदा सूची में भी प्रभावी रूप से बाहर मान लिया जाता है, तो उसके पास अपनी स्थिति सुधारने का रास्ता बेहद सीमित हो सकता है।
यही वजह है कि कोर्ट ने प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के लिए उचित अवसर सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
चुनाव आयोग ने क्या पक्ष रखा?
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि SIR के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार मतदाताओं को निर्धारित एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करना आवश्यक है। आयोग की ओर से यह भी बताया गया कि पता बदलने वाले मतदाताओं के लिए उपलब्ध प्रक्रिया SIR की गाइडलाइंस के अनुसार संचालित की जा रही है।
आयोग का तर्क था कि अगर कोई व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया में शामिल नहीं होता है और उसका नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं आता, तो उसके लिए आगे निर्धारित प्रावधानों के तहत आवेदन करने का विकल्प मौजूद है।
हालांकि, अदालत ने इस प्रक्रिया के व्यावहारिक और कानूनी प्रभाव पर सवाल उठाए। खास तौर पर यह सवाल महत्वपूर्ण रहा कि किसी मौजूदा मतदाता को ऐसी घोषणा करने के लिए कैसे कहा जा सकता है, जो उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती।
महाराष्ट्र में भी SIR को लेकर अलग याचिका
इसी बीच महाराष्ट्र में SIR से जुड़ी एक अलग याचिका पर भी बॉम्बे हाई कोर्ट की मुख्य पीठ के सामने मामला आया। वहां अदालत ने तत्काल ऐसा आदेश देने से इनकार किया, जिससे चुनाव आयोग को मतदाताओं के नाम हटाने से रोका जा सके।
अदालत के सामने यह बात रखी गई कि SIR से जुड़े मुद्दे पहले से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन हैं। ऐसे में बॉम्बे हाई कोर्ट ने समानांतर आदेश देने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट में इस विषय से संबंधित अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को प्रस्तावित है।
अब आगे क्या होगा?
गोवा मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की सुनवाई आगे जारी रहने वाली है। अदालत ने चुनाव आयोग से SIR से संबंधित एन्यूमरेशन फॉर्म और उसके साथ जुड़े दस्तावेजों की जानकारी मांगी है।
इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह सीधे मतदाता के उस अधिकार से जुड़ा है, जिसके जरिए पात्र नागरिक चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं। अदालत के सवालों से साफ है कि मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया में पात्र नागरिकों का नाम सुरक्षित रखना और उन्हें उचित सुनवाई का अवसर देना बेहद महत्वपूर्ण है।
आने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि मौजूदा मतदाताओं के पते में बदलाव, SIR के दौरान उनके नाम की स्थिति और Form 8 तथा Form 6 के इस्तेमाल को लेकर अदालत क्या दिशा तय करती है।

