नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक के रेपो रेट बढ़ाने के फैसले के बाद देश की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि देश आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है, जबकि सरकार अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाने में व्यस्त है।
आरबीआई ने बुधवार को बेंचमार्क रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की, जिसके बाद यह दर 5.50 प्रतिशत हो गई। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट बढ़ाया है।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया कि रेपो रेट में बढ़ोतरी से लोगों पर कर्ज का बोझ और बढ़ सकता है।
जयराम रमेश ने किस बात को लेकर घेरा?
कांग्रेस नेता ने रेपो रेट बढ़ोतरी को लेकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि ब्याज दर बढ़ने से कर्ज महंगा होगा और इसका असर घर, वाहन, व्यक्तिगत तथा कारोबारी कर्ज लेने वालों पर पड़ सकता है।
उन्होंने तंज कसते हुए 1961 की फिल्म ‘हम दोनों’ के एक लोकप्रिय गीत की पंक्ति का हवाला दिया और सरकार पर आर्थिक परिस्थितियों को लेकर गंभीर नहीं होने का आरोप लगाया।
रमेश के मुताबिक, एक तरफ आम परिवार महंगाई और बेरोजगारी के दबाव से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार अपनी उपलब्धियों को लेकर उत्सव के माहौल में है।
रेपो रेट बढ़ने से आम आदमी पर क्या असर?
रेपो रेट वह प्रमुख दर है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए फंड की लागत बढ़ सकती है और इसका असर विभिन्न प्रकार के कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है।
खास तौर पर फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, कार लोन और अन्य कर्ज लेने वाले ग्राहकों को ब्याज दरों में बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। इससे EMI बढ़ सकती है या कुछ मामलों में लोन की अवधि बढ़ सकती है। हालांकि वास्तविक असर बैंक, लोन के प्रकार और संबंधित बेंचमार्क पर निर्भर करेगा।
त्योहारी सीजन से ठीक पहले ब्याज दर बढ़ने के कारण इस फैसले को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
फरवरी 2023 के बाद पहली बार बढ़ी दर
आरबीआई का ताजा फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि फरवरी 2023 के बाद पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी हुई है। केंद्रीय बैंक ने इसे 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत किया है।
छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने इस बढ़ोतरी के पक्ष में सर्वसम्मति से फैसला किया। इसके साथ ही आरबीआई ने अपनी नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है। इसका संकेत है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महंगाई के दबाव को लेकर अधिक सतर्क है और भविष्य में दरों को लेकर बाजार को राहत की उम्मीद कम दिखाई दे रही है।
महंगाई और कच्चे तेल की कीमत बनी बड़ी चुनौती
रेपो रेट बढ़ाने के पीछे महंगाई का दबाव प्रमुख कारणों में है। ताजा अनुमानों के मुताबिक सितंबर में खुदरा महंगाई अगस्त के 4.82 प्रतिशत से बढ़कर करीब 5.40 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। खाद्य और ऊर्जा कीमतों के साथ-साथ कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भी दबाव बढ़ाया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर रुपये, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है।
कमजोर रुपये का भी उठाया मुद्दा
जयराम रमेश ने रुपये की कमजोरी को भी अर्थव्यवस्था से जुड़े दबाव का संकेत बताया। ताजा कारोबार में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 96.78 के स्तर तक कमजोर हुआ और अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया। महंगा कच्चा तेल रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है क्योंकि तेल आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत होती है।
कांग्रेस नेता ने इसी के साथ शेयर बाजार, विदेशी निवेश, बेरोजगारी और आमदनी में कमी जैसे मुद्दों को भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने पिछले नौ महीनों में भारतीय शेयर बाजार से करीब चार लाख करोड़ रुपये निकाले हैं। यह आंकड़ा कांग्रेस नेता के दावे के रूप में सामने आया है।
दिलचस्प बात: GDP पर आरबीआई का अनुमान बढ़ा
हालांकि तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। आरबीआई ने 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया है। यानी केंद्रीय बैंक के मुताबिक आर्थिक गतिविधियों में मजबूती बनी हुई है, लेकिन महंगाई का जोखिम बढ़ा है।
यही अंतर मौजूदा राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। कांग्रेस जहां महंगाई, बेरोजगारी, महंगे कर्ज और रुपये की कमजोरी को लेकर सरकार को घेर रही है, वहीं मौद्रिक नीति के स्तर पर आरबीआई का जोर फिलहाल कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने पर है।
आगे क्या होगा?
रेपो रेट बढ़ने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले महीनों में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होगी। आरबीआई के ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ रुख ने बाजार में इस संभावना को जरूर बढ़ाया है।
कच्चे तेल की कीमत, खाद्य महंगाई, रुपये की स्थिति और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां आने वाले समय में आरबीआई के फैसलों के लिए अहम रहेंगी। कुछ बाजार विश्लेषकों ने दिसंबर में एक और 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की संभावना जताई है।

