कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 9 अक्टूबर 2026 को आए विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने सबका ध्यान खींचा है। नंदीग्राम और रेजिनगर, दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जीत दर्ज की। नंदीग्राम में हसीरानी रथ ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को बड़े अंतर से हराया, जबकि रेजिनगर में भाजपा के शंखरव सरकार ने भी शानदार जीत हासिल की। इन परिणामों को राज्य में भाजपा की राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नंदीग्राम में भाजपा की जीत इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि यह क्षेत्र पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। वहीं, रेजिनगर में जीत ने भाजपा को एक ऐसे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर दिया, जहां चुनावी मुकाबले को लेकर खास दिलचस्पी थी। दोनों सीटों पर जीत ने विपक्षी दलों के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।
नंदीग्राम में हसीरानी रथ की रिकॉर्ड जीत
नंदीग्राम विधानसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार हसीरानी रथ ने कांग्रेस के मिलन प्रधान को 1,22,753 मतों के अंतर से हराकर बड़ी जीत दर्ज की। इस परिणाम ने सीट पर भाजपा के प्रभाव को और मजबूत किया है।
हसीरानी रथ का नाम चुनाव से पहले भी चर्चा में रहा था। वह चंद्रनाथ रथ की मां हैं, जो सुवेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी थे और मई 2026 में उनकी हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद नंदीग्राम का उपचुनाव राजनीतिक रूप से और संवेदनशील हो गया था।
मतगणना के शुरुआती दौर से ही भाजपा उम्मीदवार ने बढ़त बनाए रखी। जैसे-जैसे राउंड आगे बढ़े, अंतर बढ़ता गया और आखिरकार उनकी जीत बड़े अंतर के साथ सामने आई। कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान दूसरे स्थान पर रहे। इस नतीजे ने नंदीग्राम में भाजपा के चुनावी आधार को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
रेजिनगर में भी भाजपा ने मारी बाजी
मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर विधानसभा सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार शंखरव सरकार ने जीत हासिल की। मतगणना के दौरान उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर लगातार बढ़त बनाए रखी। शुरुआती राउंड में ही भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में बड़ा अंतर दिखाई देने लगा था और बाद के दौर में यह बढ़त और मजबूत हुई।
रेजिनगर में मुकाबला इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहां आम जनता उन्नयन पार्टी और कांग्रेस सहित कई दल चुनावी मैदान में थे। आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर के बेटे गुलाम नबी आजाद भी चुनाव लड़ रहे थे। ऐसे में भाजपा की जीत ने इस सीट के राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
रेजिनगर का नतीजा यह भी दिखाता है कि विधानसभा उपचुनाव में स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों की पहचान और दलों के संगठनात्मक प्रभाव की भूमिका महत्वपूर्ण रही। हालांकि, इन दो सीटों के परिणामों के आधार पर पूरे राज्य के मतदाताओं की पसंद के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
आखिर क्यों हुए दोनों सीटों पर उपचुनाव?
नंदीग्राम और रेजिनगर में उपचुनाव की नौबत विधायकों द्वारा अपनी सीटें छोड़ने के कारण आई थी।
2026 के विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों सीटों से जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखने का फैसला किया और नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया। इसी वजह से नंदीग्राम में उपचुनाव कराना पड़ा।
दूसरी ओर, आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने रेजिनगर और नौदा, दोनों सीटों से चुनाव जीता था। उन्होंने नौदा सीट अपने पास रखी और रेजिनगर छोड़ दी। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने रेजिनगर में भी उपचुनाव कराया।
दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर 2026 को मतदान हुआ था। नंदीग्राम में 80.89 प्रतिशत और रेजिनगर में 80.08 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। भारी मतदान के कारण चुनाव परिणामों को लेकर राजनीतिक दलों और समर्थकों की उत्सुकता बनी हुई थी।
भाजपा के लिए क्या हैं इन नतीजों के मायने?
नंदीग्राम और रेजिनगर में जीत भाजपा के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। नंदीग्राम में बड़े अंतर से जीत पार्टी को अपने प्रभावशाली क्षेत्रों में मजबूती का संदेश देती है। वहीं, रेजिनगर में जीत से पार्टी को उन क्षेत्रों में भी अपनी स्थिति पर चर्चा करने का अवसर मिला है, जहां चुनावी मुकाबला बहुकोणीय था।
इन परिणामों का असर आने वाले समय में राज्य के राजनीतिक विमर्श पर पड़ सकता है। भाजपा इन जीतों को अपने समर्थन के विस्तार के रूप में पेश कर सकती है, जबकि विपक्षी दलों के सामने अपने संगठन और चुनावी रणनीति की समीक्षा करने की चुनौती होगी।
हालांकि, उपचुनाव का परिणाम और पूरे राज्य में विधानसभा चुनाव का जनादेश अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में तय होते हैं। इसलिए इन दो सीटों की जीत को राज्यव्यापी समर्थन का पूर्ण प्रमाण मानने के बजाय स्थानीय चुनावी परिस्थितियों के संदर्भ में देखना जरूरी है।
विपक्ष के लिए बढ़ी चुनौती
दोनों सीटों पर भाजपा की जीत ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए आत्ममंथन की स्थिति पैदा की है। नंदीग्राम में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही, जबकि रेजिनगर में विभिन्न दलों के बीच वोटों का बंटवारा भी मुकाबले का अहम पहलू रहा।
आने वाले समय में विपक्षी दलों की रणनीति, उम्मीदवारों का चयन और स्थानीय मुद्दों पर उनकी पकड़ महत्वपूर्ण होगी। वहीं भाजपा के सामने इन जीतों को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलने की चुनौती रहेगी।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दोनों नतीजों पर आगे भी चर्चा जारी रहने की संभावना है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि भाजपा इन सफलताओं को संगठनात्मक मजबूती में कैसे बदलती है और विपक्ष अपनी राजनीतिक रणनीति में क्या बदलाव करता है।

