नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। ईरान के रणनीतिक क़ेश्म द्वीप पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की खबर सामने आने के बाद पश्चिम एशिया में हलचल तेज हो गई है। ईरानी सरकारी मीडिया ने द्वीप पर कई धमाकों की सूचना दी है, वहीं अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई जानकारी में कहा गया है कि अमेरिकी सेना ने क्षेत्र में कुछ ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई सीमित स्तर पर की गई और इसे रक्षात्मक कदम बताया गया है।
इस घटनाक्रम की सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका की ओर से की गई कार्रवाई को लेकर शुरुआत में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि क़ेश्म द्वीप पर हमला हाल के सप्ताहों में किए गए ऐसे कई सीमित सैन्य अभियानों का हिस्सा था, जिन्हें सार्वजनिक रूप से प्रमुखता से सामने नहीं लाया गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष फिर से बड़े सैन्य अभियान की तरफ बढ़ रहा है?
क़ेश्म द्वीप पर क्या हुआ? क्यों चर्चा में आया अमेरिकी हमला?
ईरान के सरकारी प्रसारण माध्यमों ने क़ेश्म द्वीप पर कई धमाकों की आवाजें सुनाई देने की जानकारी दी। इसके बाद अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर खबरें सामने आईं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, अमेरिकी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास कुछ ईरानी ठिकानों पर सीमित रक्षात्मक हमले किए।
एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि ईरानी बलों की ओर से अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया था। इसके जवाब में उन ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिन्हें अमेरिकी संपत्तियों के लिए खतरा माना गया।
हालांकि, अमेरिकी सेंट्रल कमांड की ओर से शुरुआती खबरों के समय विस्तृत सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया था। इसलिए हमले में हुए नुकसान, निशाना बनाए गए सभी ठिकानों और संभावित हताहतों की पूरी जानकारी स्पष्ट नहीं है।

आखिर क़ेश्म द्वीप इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
क़ेश्म द्वीप ईरान के दक्षिणी तट के पास स्थित है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रवेश क्षेत्र के बेहद करीब है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन रास्तों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से का अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचना इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर करता है।
इस द्वीप का महत्व केवल भौगोलिक नहीं है। यहां ईरान की सैन्य मौजूदगी और नौसैनिक गतिविधियों से जुड़े ठिकाने भी हैं। रिपोर्टों में यहां मिसाइल भंडारण और नौसैनिक अड्डे जैसी सुविधाओं का जिक्र किया गया है। इसके अलावा द्वीप पर समुद्री जल को पीने योग्य बनाने वाला संयंत्र भी मौजूद है।
यही वजह है कि क़ेश्म द्वीप के आसपास किसी भी सैन्य गतिविधि का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहता। यहां तनाव बढ़ने से खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है।
अमेरिका ने हमले को गुप्त क्यों रखा?
इस घटनाक्रम से जुड़ी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका ने हाल के सप्ताहों में ईरान के खिलाफ कई छोटे सैन्य अभियान चलाए, लेकिन उन्हें बड़े सैन्य अभियान की तरह सार्वजनिक नहीं किया गया।
बताया गया कि इन कार्रवाइयों को सीमित रखने का उद्देश्य यह संकेत देने से बचना था कि अमेरिका ईरान के खिलाफ व्यापक युद्ध फिर से शुरू करना चाहता है। अमेरिकी अधिकारियों ने इन हमलों को रक्षात्मक कार्रवाई के रूप में पेश किया है।
इस समय अमेरिका के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपने सैन्य और समुद्री हितों की सुरक्षा करनी है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ बातचीत की संभावनाओं को भी बनाए रखना है।
ऐसे में सीमित सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक बातचीत साथ-साथ चलती दिखाई दे रही हैं। हालांकि, इस रणनीति के सफल होने या तनाव कम होने की अभी कोई गारंटी नहीं है।
ट्रंप के बयान और हमले के समय ने बढ़ाई चर्चा
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ संभावित समझौते की संभावना का संकेत दे चुके थे। अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले उनसे जब पूछा गया कि क्या वह चुनाव के बाद ईरान पर फिर हमला करने पर विचार कर रहे हैं, तो उन्होंने इनकार किया था।
इसके बावजूद क़ेश्म द्वीप पर धमाकों और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की खबर ने नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से कार्रवाई को सीमित और रक्षात्मक बताया जाना इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन फिलहाल बड़े सैन्य अभियान और सीमित जवाबी कार्रवाई के बीच अंतर बनाए रखना चाहता है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी बातचीत के जरिए समाधान निकलने की संभावना को लेकर सकारात्मक संकेत दिए थे। हालांकि, उन्होंने यह शर्त भी रखी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा विकसित करने की कोशिश न करे और इस संबंध में भरोसेमंद आश्वासन दे।
ईरान-अमेरिका बातचीत के बीच बढ़ा सैन्य दबाव
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की कोशिशें भी जारी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कतर की मध्यस्थता से संभावित समझौते के एक प्रारूप पर चर्चा हुई है। इसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हमलों को रोकने और ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नाकेबंदी हटाने जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
दूसरी ओर, ईरान ने संकेत दिया है कि वह बातचीत और संघर्ष, दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार है। ईरान चाहता है कि किसी भी समझौते में उसे सुरक्षा की ठोस गारंटी मिले और अमेरिका भविष्य में समझौते से पीछे न हटे।
इस बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की ओर से भी ईरान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की खबरें सामने आई हैं। क्षेत्रीय देशों को आशंका है कि यदि संघर्ष फिर बढ़ा तो इसमें अन्य सशस्त्र संगठन और क्षेत्रीय ताकतें भी शामिल हो सकती हैं।
क्या फिर शुरू होगा बड़ा युद्ध?
क़ेश्म द्वीप पर अमेरिकी कार्रवाई की खबर ने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा किया है कि क्या दोनों देशों के बीच युद्ध फिर व्यापक रूप ले सकता है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी सीमित सैन्य हमलों और रक्षात्मक कार्रवाई की ओर इशारा करती है। इसे बड़े पैमाने पर युद्ध की आधिकारिक वापसी नहीं कहा जा सकता।
लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की संवेदनशील स्थिति, ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया की चेतावनी और अमेरिका की सुरक्षा संबंधी चिंताएं हालात को तेजी से बदल सकती हैं।
यदि समुद्री मार्ग पर हमले बढ़ते हैं या किसी अमेरिकी सैन्य ठिकाने को बड़ा नुकसान पहुंचता है तो जवाबी कार्रवाई और तेज हो सकती है। इसका असर तेल की कीमतों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ने की आशंका है।
फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के अगले कदम पर है। क्या दोनों देश बातचीत के रास्ते तनाव कम करेंगे या क़ेश्म द्वीप की घटना संघर्ष का नया अध्याय शुरू करेगी, इसका जवाब आने वाले दिनों में मिल सकता है।

