भारत: में मतदान का अधिकार लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण बुनियाद माना जाता है। देश का संविधान 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पात्र नागरिकों को चुनाव में वोट डालने का अधिकार देता है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने इसी अधिकार को लेकर ऐसी टिप्पणी की है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। काटजू ने दावा किया कि भारत के 95 प्रतिशत लोगों के दिमाग में गोबर भरा हुआ है और ऐसे लोगों को वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
उनका बयान यहीं नहीं रुका। उन्होंने कथित तौर पर यहां तक कहा कि देश में वोट चोरी और होनी चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार बड़ी संख्या में मतदाता उम्मीदवार की योग्यता और कामकाज देखने के बजाय जाति के आधार पर वोट डालते हैं। इस टिप्पणी के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या चुनावी व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाने के लिए मतदाताओं के अधिकार को ही निशाने पर लेना उचित है?
किसने दिया 95 प्रतिशत भारतीयों को लेकर विवादित बयान?
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने एक यूट्यूब इंटरव्यू के दौरान की। बातचीत में उनसे वोट चोरी और भारतीय चुनाव व्यवस्था को लेकर सवाल पूछा गया था। जवाब में उन्होंने कहा कि उन्होंने पहले भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है और उनके अनुसार देश के अधिकांश मतदाता वोट देने के योग्य व्यवहार नहीं करते।
काटजू ने दावा किया कि लगभग 95 प्रतिशत मतदाता उम्मीदवार की योग्यता, नीतियों और कामकाज पर ध्यान नहीं देते। इसके बजाय वे जाति और समुदाय के आधार पर मतदान करते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि ऐसे लोगों के सिर में गोबर भरा हुआ है और उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसे मतदाता जाति के आधार पर वोट डालते हैं, तो वोट चोरी होने पर उन्हें शिकायत नहीं करनी चाहिए। उनका यह बयान अब चर्चा का विषय बन गया है।
‘और होनी चाहिए वोट चोरी’, आखिर क्यों कही यह बात?
इंटरव्यू में काटजू ने वोट चोरी के मुद्दे पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अगर मतदाता जाति और सांप्रदायिकता के आधार पर वोट डालते हैं, तो उनके अनुसार ऐसी स्थिति में और वोट चोरी होनी चाहिए।
उनका तर्क था कि चुनाव में मतदाताओं को उम्मीदवार की योग्यता, महंगाई, बेरोजगारी और अन्य बुनियादी मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए। लेकिन उनके मुताबिक बड़ी संख्या में लोग इन मुद्दों को नजरअंदाज कर जाति और धर्म के आधार पर मतदान करते हैं।
हालांकि, यह उनकी व्यक्तिगत राय और राजनीतिक व्यवस्था पर उनकी आलोचना है। वोट चोरी या मतदान प्रक्रिया में किसी भी तरह की हेराफेरी को लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर मामला माना जाता है। किसी मतदाता के चुनावी व्यवहार को लेकर असहमति उसके संवैधानिक अधिकार को अपने आप समाप्त नहीं करती।
भारतीय लोकतंत्र को लेकर भी उठाए सवाल
मार्कंडेय काटजू ने केवल मतदाताओं पर टिप्पणी नहीं की, बल्कि भारत में लोकतंत्र की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि देश में लगातार चुनावी माहौल बना रहता है और राजनीतिक दल चुनाव के दौरान हिंदू-मुस्लिम जैसे मुद्दों पर नफरत फैलाते हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि लगातार होने वाले चुनाव जातिवाद और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था इन सामाजिक समस्याओं को और मजबूत कर सकती है।
यह टिप्पणी उनके राजनीतिक और सामाजिक विचारों को दर्शाती है। हालांकि, लोकतंत्र के पक्ष में एक महत्वपूर्ण तर्क यह है कि चुनाव नागरिकों को सरकार चुनने, बदलने और जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगने का अवसर देते हैं। चुनावी प्रक्रिया में सुधार की मांग और मतदान के अधिकार को सीमित करने की मांग दो अलग-अलग बातें हैं।

पहले भी विवादों में रहे हैं मार्कंडेय काटजू
मार्कंडेय काटजू इससे पहले भी भारतीय नागरिकों और मतदान के व्यवहार को लेकर विवादित बयान दे चुके हैं। वर्ष 2012 में उन्होंने लगभग 90 प्रतिशत भारतीयों को ‘मूर्ख’ बताते हुए कहा था कि बड़ी संख्या में लोग जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंधविश्वास से प्रभावित होकर फैसले लेते हैं।
उस समय उन्होंने अपने बयान की सफाई देते हुए कहा था कि 90 प्रतिशत का आंकड़ा कोई गणितीय तथ्य नहीं, बल्कि उनकी राय को व्यक्त करने का तरीका था। उन्होंने यह भी कहा था कि उनका उद्देश्य लोगों को अपमानित करना नहीं, बल्कि सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूक करना था।
वर्ष 2013 में उन्होंने अपने कुछ बयानों से लोगों की भावनाएं आहत होने पर खेद भी जताया था। ऐसे में उनका ताजा बयान पुराने विवादों की याद भी दिला रहा है।
क्या संविधान किसी नागरिक से छीन सकता है वोट का अधिकार?
भारत में मतदान का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत वयस्क मताधिकार के सिद्धांत से जुड़ा है। इसके अनुसार 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के भारतीय नागरिक, निर्धारित कानूनी शर्तों के अधीन, मतदाता के रूप में पंजीकरण करा सकते हैं।
मतदान का अधिकार किसी व्यक्ति की जाति, धर्म, शिक्षा, राजनीतिक पसंद या किसी नेता के प्रति समर्थन के आधार पर तय नहीं होता। कानून में निर्धारित अयोग्यताओं और प्रक्रियाओं के अलावा किसी नागरिक को केवल इसलिए मतदान से वंचित नहीं किया जा सकता कि कोई दूसरा व्यक्ति उसके राजनीतिक फैसले से सहमत नहीं है।
इसलिए काटजू की टिप्पणी को एक पूर्व न्यायाधीश की व्यक्तिगत राय के रूप में देखना जरूरी है, न कि किसी कानूनी आदेश या संवैधानिक बदलाव के रूप में। फिलहाल उनके बयान से मतदान के अधिकार में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
CJP प्रोटेस्ट को लेकर भी की टिप्पणी
इसी बातचीत में काटजू ने CJP प्रोटेस्ट और उससे जुड़े कुछ लोगों की भूमिका पर भी टिप्पणी की। उन्होंने अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका द्वारा कथित तौर पर पीस बॉन्ड भरे जाने पर सवाल उठाए।
काटजू का दावा था कि पीस बॉन्ड भरने से आंदोलनकारियों की छवि प्रभावित हुई है और इससे उनके आंदोलन की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसे कदमों के बाद जनता का भरोसा कम हो सकता है।
यह भी उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक टिप्पणी है। संबंधित लोगों की प्रतिक्रिया और पूरे घटनाक्रम के अन्य पक्षों को जाने बिना इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

