Lucknow Mayor Shock: हाईकोर्ट ने फ्रीज किए मेयर के सारे अधिकार, पार्षद को शपथ न दिलाना पड़ा भारी

Lucknow Mayor News: हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन, मेयर के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार फ्रीज

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नगर निगम से जुड़ा एक मामला अब बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन गया है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए लखनऊ मेयर के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों को फ्रीज कर दिया। अदालत ने यह सख्त कदम वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज (तृतीय) से निर्वाचित समाजवादी पार्टी के पार्षद ललित किशोर तिवारी को समय पर शपथ न दिलाने के मामले में उठाया है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि जब तक कोर्ट द्वारा निर्वाचित घोषित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर अपने प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। अदालत के आदेश के बाद नगर निगम प्रशासन में हलचल मच गई है।

अब DM और नगर आयुक्त संभालेंगे कामकाज

कोर्ट के आदेश के बाद लखनऊ नगर निगम के वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी अब जिलाधिकारी (DM) और नगर आयुक्त संभालेंगे। हाईकोर्ट ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि कई आदेशों और निर्देशों के बावजूद निर्वाचित पार्षद को शपथ नहीं दिलाई गई।

न्यायालय ने इस मामले को प्रशासनिक लापरवाही और अदालत के आदेशों की अनदेखी माना है। कोर्ट ने पहले भी कई बार संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए थे, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद लखनऊ नगर निकाय चुनाव 2023 से जुड़ा हुआ है। वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज (तृतीय) में भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ललित तिवारी के बीच सीधा मुकाबला हुआ था।

मतगणना के दौरान भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला को 4,972 वोट मिले थे, जबकि सपा प्रत्याशी ललित तिवारी को 3,298 वोट प्राप्त हुए थे। इसके आधार पर प्रदीप कुमार शुक्ला को विजयी घोषित कर दिया गया था।

हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद ललित तिवारी ने कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा प्रत्याशी ने नामांकन पत्र दाखिल करते समय जरूरी जानकारियां छिपाई थीं और निर्वाचन प्रपत्रों में आवश्यक विवरण नहीं दिए थे।

कोर्ट ने रद्द किया था भाजपा प्रत्याशी का निर्वाचन

करीब ढाई साल तक चली सुनवाई के बाद लखनऊ की अपर जिला जज अदालत ने मामले में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने नामांकन के दौरान दाखिल एफिडेविट, शपथ पत्र और अन्य दस्तावेजों की जांच के बाद पाया कि आवश्यक जानकारी छिपाना गंभीर अनियमितता है।

कोर्ट ने कहा कि यह चुनावी प्रक्रिया और नियमों का उल्लंघन है, जिससे चुनाव की वैधता प्रभावित होती है। इसी आधार पर भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर दिया गया और समाजवादी पार्टी के ललित किशोर तिवारी को निर्वाचित घोषित कर दिया गया।

पांच महीने बाद भी नहीं दिलाई गई शपथ

ललित किशोर तिवारी को 19 दिसंबर 2025 को अदालत द्वारा निर्वाचित घोषित किया गया था। लेकिन इसके बावजूद पांच महीने तक उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई।

इस बीच पूर्व पार्षद ही अपने दायित्व निभाते रहे। ललित तिवारी ने न्यायालय में कहा कि प्रशासन लगातार टालमटोल कर रहा है और अदालत के आदेशों का पालन नहीं किया जा रहा।

हाईकोर्ट ने पहले भी दिए थे निर्देश

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि जिला मजिस्ट्रेट ने 23 जनवरी और 10 फरवरी 2026 को नगर आयुक्त को पत्र लिखकर शपथ दिलाने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा था। राज्य सरकार ने भी 4 फरवरी 2026 को इस संबंध में निर्देश जारी किए थे।

इसके बाद 12 मई को हाईकोर्ट ने एक सप्ताह के भीतर शपथ दिलाने का आदेश दिया था। हालांकि भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल कर इस आदेश को चुनौती दी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

इसके बावजूद जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तब हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया।

राजनीतिक गलियारों में मचा हड़कंप

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद लखनऊ की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है, जबकि भाजपा खेमे में इस फैसले को लेकर चर्चा तेज है।

नगर निगम प्रशासन के अधिकार फ्रीज होने से कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं और फाइलों पर असर पड़ सकता है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन कब तक कोर्ट के आदेश का पालन करता है।

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