गुजरात: के सूरत से सामने आए एक विवाद ने देशभर में बहस छेड़ दी है। आईवियर कंपनी Lenskart पर एक युवक ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि उसे धार्मिक पहचान से जुड़े प्रतीकों—तिलक और चोटी—को हटाने से इनकार करने पर नौकरी से निकाल दिया गया।
यह आरोप ऐसे समय में सामने आया है जब कॉर्पोरेट ड्रेस कोड और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर पहले से ही चर्चा तेज है।
क्या है पूरा मामला?
सूरत निवासी जील सोगसिया, जिन्होंने खुद को कंपनी का पूर्व कर्मचारी बताया है, ने एक वीडियो जारी कर दावा किया कि उन्हें कंपनी में शामिल होने के दौरान ‘ग्रूमिंग स्टैंडर्ड’ के तहत अपनी चोटी (शिखा) काटने, माथे का तिलक हटाने और ‘ओम’ का निशान मिटाने के लिए कहा गया था।
युवक के मुताबिक, उन्होंने इस निर्देश को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्हें ट्रेनिंग प्रोग्राम से बाहर कर दिया गया, जिसे वे अपनी नौकरी समाप्ति के रूप में देख रहे हैं।
वीडियो वायरल, बहस तेज
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब Anand Ranganathan ने इस वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर शेयर किया। उन्होंने इस घटना को “भेदभाव और कट्टरता” करार दिया और कंपनी से युवक को वापस नौकरी देने की मांग की।
वीडियो वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कुछ यूजर्स ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया, तो कुछ ने कॉर्पोरेट नियमों के पालन को जरूरी बताया।

युवक का दावा: पहले नहीं दी गई जानकारी
जील सोगसिया ने अपने बयान में कहा कि उन्हें 10 दिसंबर 2025 को कंपनी की ओर से कॉल आया था और ट्रेनिंग के लिए बुलाया गया। उस समय उन्हें यह नहीं बताया गया कि उन्हें अपनी धार्मिक पहचान से जुड़े प्रतीकों को हटाना होगा।
उन्होंने कहा कि ट्रेनिंग के दौरान उन्हें बताया गया कि “प्रोग्राम जारी रखने के लिए ग्रूमिंग स्टैंडर्ड का पालन करना जरूरी है।” जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो उन्हें प्रोग्राम से बाहर कर दिया गया।
कंपनी पहले भी दे चुकी है सफाई
इस विवाद के बीच कंपनी के संस्थापक और CEO Peyush Bansal का पहले दिया गया बयान भी चर्चा में आ गया है।
दरअसल, कुछ समय पहले लेंसकार्ट के एक आंतरिक दस्तावेज को लेकर विवाद हुआ था, जिसमें कथित तौर पर ऑफिस में तिलक और बिंदी लगाने पर रोक का जिक्र था, जबकि हिजाब की अनुमति दी गई थी।
इस पर सफाई देते हुए कंपनी ने कहा था कि यह दस्तावेज पुराना और त्रुटिपूर्ण था तथा वर्तमान नीति को प्रतिबिंबित नहीं करता। कंपनी के अनुसार, इसमें गलती से कुछ शब्द शामिल हो गए थे, जिन्हें बाद में हटा दिया गया।
कानूनी और सामाजिक पहलू
यह मामला अब केवल एक कंपनी और कर्मचारी के बीच का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यापक सवाल खड़ा कर रहा है—क्या कॉर्पोरेट ड्रेस कोड व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता से ऊपर हो सकता है?
भारतीय संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और अभिव्यक्त करने का अधिकार है। वहीं कंपनियों को भी अपने कार्यस्थल के लिए कुछ मानक तय करने का अधिकार होता है।
इसी संतुलन को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ का कहना है कि ड्रेस कोड पेशेवर वातावरण बनाए रखने के लिए जरूरी है, जबकि अन्य इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप मानते हैं।
सोशल मीडिया पर दो ध्रुवों में बंटी राय
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। एक वर्ग इसे धार्मिक भेदभाव बता रहा है और कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है। वहीं दूसरा वर्ग कह रहा है कि हर कंपनी के अपने नियम होते हैं, जिन्हें जॉइन करने से पहले समझना और मानना जरूरी होता है।
आगे क्या?
फिलहाल कंपनी की ओर से इस नए आरोप पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन यह मामला आने वाले दिनों में कानूनी और सामाजिक स्तर पर और बड़ा रूप ले सकता है।
यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह कॉर्पोरेट नीतियों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर एक मिसाल बन सकता है।