नई दिल्ली। देश में तेजाब हमलों की रोकथाम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। एसिड अटैक से जुड़े एक जनहित याचिका मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने खुदरा दुकानों में तेजाब की बिक्री को बेहद सीमित करने और जरूरत पड़ने पर इसे पूरी तरह प्रतिबंधित करने की संभावना पर विचार किया। इस मामले में संबंधित अधिकारियों से जवाब भी मांगा गया है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब तेजाब हमलों के पीड़ित लंबे समय तक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक परेशानियों से जूझते हैं। अदालत के सामने सुनवाई के दौरान पीड़ितों की समस्याओं और मौजूदा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर मुद्दे रखे गए।
खुदरा दुकानों में तेजाब की बिक्री पर बड़ा सवाल
सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा तेजाब की खुले बाजार में उपलब्धता को लेकर रहा। अदालत ने इस संभावना पर विचार किया कि खुदरा दुकानों में तेजाब की बिक्री को इतना सीमित किया जाए कि उसका दुरुपयोग करना मुश्किल हो जाए। यहां तक कि पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की संभावना पर भी संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया।
हालांकि, फिलहाल इसे सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस मुद्दे पर संबंधित पक्षों का पक्ष जानने के लिए जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में प्राप्त जवाबों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर अदालत इस विषय पर आगे निर्देश दे सकती है।
तेजाब की आसानी से उपलब्धता लंबे समय से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों के केंद्र में रही है। तेजाब हमले के मामलों में इसका इस्तेमाल पीड़ितों को गंभीर और कई बार स्थायी चोट पहुंचाने के लिए किया जाता है।
पीड़ित ने अदालत में बताया 17 साल पुराना दर्द
सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता ने अपने व्यक्तिगत अनुभव के जरिए तेजाब हमले के लंबे असर को अदालत के सामने रखा। उन्होंने बताया कि वह करीब 17 साल पहले तेजाब हमले का शिकार हुए थे और आज भी इसके प्रभाव से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए हैं।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, उन्हें नींद के लिए दवा लेनी पड़ती है। उन्होंने अदालत को बताया कि तेजाब हमले का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीड़ित के मानसिक स्वास्थ्य और सामान्य जीवन पर भी लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है।
उन्होंने कहा कि तेजाब हमले के बाद पीड़ित को शारीरिक उपचार के साथ-साथ मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी संघर्ष करना पड़ता है। उनके मुताबिक, उन्होंने ऐसे तीन अन्य पीड़ितों को भी देखा है, जिनमें एक 14 वर्षीय बच्चा भी शामिल है।
याचिकाकर्ता ने मौजूदा व्यवस्था को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार की गाइडलाइंस पुरानी हो चुकी हैं और हर बार कार्रवाई की बात किए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते।
अदालत ने NGO की भूमिका पर भी दिया जोर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के इलाज और जागरूकता के क्षेत्र में गैर-सरकारी संगठनों यानी NGOs की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना।
अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया कि तेजाब हमले के बाद पीड़ितों को सही चिकित्सा सलाह और उपचार की जानकारी मिलना बेहद जरूरी है। अदालत ने खास तौर पर पारंपरिक उपचार पद्धतियों से जुड़े संभावित जोखिमों के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत पर जोर दिया।
NGOs पीड़ितों और उनके परिवारों को उचित चिकित्सा सहायता, कानूनी मदद और पुनर्वास संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही वे समाज में तेजाब हमलों के खिलाफ जागरूकता अभियान भी चला सकते हैं।
पुरानी गाइडलाइंस पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह सवाल उठाया गया कि मौजूदा सरकारी दिशा-निर्देश पर्याप्त प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो पा रहे हैं। केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
खुदरा दुकानों में तेजाब की बिक्री पर नियंत्रण, खरीददारों की पहचान, बिक्री का रिकॉर्ड और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दे पहले भी चर्चा में रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की ताजा सुनवाई के बाद इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर एक बार फिर ध्यान केंद्रित हुआ है।
आगे क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। इसलिए अब अगली कार्यवाही में यह महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित प्राधिकरण तेजाब की खुदरा बिक्री को नियंत्रित करने के मौजूदा नियमों, उनके क्रियान्वयन और संभावित नए उपायों को लेकर क्या जानकारी अदालत के सामने रखते हैं।
अगर अदालत बिक्री को और सीमित करने या किसी व्यापक प्रतिबंध की दिशा में आगे बढ़ती है, तो इसका असर तेजाब बेचने वाले खुदरा कारोबार से लेकर औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोग तक पड़ सकता है। ऐसे में किसी भी नए नियम में वैध औद्योगिक जरूरतों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन भी महत्वपूर्ण होगा।
एसिड अटैक के खिलाफ सख्ती का संकेत
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि तेजाब हमलों को रोकने के लिए केवल अपराध होने के बाद सजा देना पर्याप्त है या हमले में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ की उपलब्धता पर भी अधिक प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।
पीड़ितों की ओर से अदालत में रखी गई व्यक्तिगत पीड़ा यह भी बताती है कि तेजाब हमला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि पीड़ित के जीवन पर लंबे समय तक असर डालने वाली त्रासदी हो सकती है।
फिलहाल अदालत ने खुदरा दुकानों में तेजाब की बिक्री पर अंतिम प्रतिबंध लगाने का आदेश नहीं दिया है। संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है और आगे की सुनवाई में इस मुद्दे पर अदालत का रुख और स्पष्ट हो सकता है।
एसिड अटैक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की ताजा सुनवाई ने तेजाब की खुदरा बिक्री पर नियंत्रण को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। अदालत ने बिक्री को बेहद सीमित करने या पूरी तरह प्रतिबंधित करने की संभावना पर विचार करते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। अब अगली सुनवाई में यह देखना अहम होगा कि सरकार मौजूदा नियमों और उनके क्रियान्वयन को लेकर क्या जवाब देती है।

