वाशिंगटन। पृथ्वी के भविष्य और जलवायु परिवर्तन को लेकर टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ Elon Musk का एक बयान चर्चा में है। मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पृथ्वी के दीर्घकालिक जलवायु जोखिमों को लेकर चिंता जताई और भविष्य में अंतरिक्ष आधारित तकनीक के इस्तेमाल का सुझाव दिया।
मस्क के बयान में करीब 50 साल की समयसीमा का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इसे इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि वैज्ञानिकों ने यह तय कर दिया है कि ठीक 50 साल बाद पृथ्वी खत्म हो जाएगी। मस्क का बयान मुख्य रूप से बेहद लंबे समय के जलवायु जोखिमों और उन्हें नियंत्रित करने के लिए संभावित भविष्य की तकनीकों पर आधारित एक परिकल्पना है।
मस्क ने क्यों दी 50 साल की चेतावनी?
मस्क का तर्क है कि पृथ्वी को लंबे समय तक रहने योग्य बनाए रखने के लिए केवल सस्टेनेबल एनर्जी की ओर बढ़ना पर्याप्त नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, भविष्य में ग्रह के तापमान को नियंत्रित करने के लिए अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों और बड़े पैमाने पर जियो-इंजीनियरिंग जैसी तकनीकों की जरूरत पड़ सकती है।
उन्होंने अपने पोस्ट में पृथ्वी के इतिहास में होने वाली बड़ी विलुप्ति घटनाओं का भी उल्लेख किया। मस्क के अनुसार, अत्यधिक गंभीर विलुप्ति की घटनाएं बेहद लंबे अंतराल पर होती रही हैं और भविष्य में ऐसे जोखिमों से निपटने के लिए मानव सभ्यता को तकनीकी समाधान विकसित करने पड़ सकते हैं।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि मस्क की यह समयसीमा कोई स्थापित वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं है। 50 साल वाली बात को पृथ्वी के निश्चित रूप से समाप्त होने की तारीख के तौर पर पेश करना भ्रामक होगा।

चांद से अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे ‘मास ड्राइवर’?
मस्क ने भविष्य के जिस समाधान का जिक्र किया है, उसमें चंद्रमा और अंतरिक्ष तकनीक की अहम भूमिका है। उन्होंने चंद्रमा पर मास ड्राइवर स्थापित करने की कल्पना रखी है।
मास ड्राइवर एक ऐसी संभावित तकनीक है, जिसके जरिए विद्युतचुंबकीय प्रणाली का इस्तेमाल करके सामग्री को बिना पारंपरिक रॉकेट ईंधन के अंतरिक्ष में भेजने की कल्पना की जाती है।
मस्क के विचार के मुताबिक, भविष्य में चंद्रमा से ऐसी प्रणाली के जरिए उपकरण या अन्य सामग्री अंतरिक्ष में भेजी जा सकती है।
पृथ्वी के तापमान को कैसे नियंत्रित करेंगे सैटेलाइट?
मस्क की परिकल्पना का अगला हिस्सा और भी ज्यादा भविष्यवादी है। उन्होंने पृथ्वी और सूर्य के बीच स्थित लैग्रेंज पॉइंट्स के आसपास सैटेलाइट्स की तैनाती की बात कही है।
इन क्षेत्रों में अंतरिक्ष यान को अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में रखने के लिए विशेष कक्षीय परिस्थितियों का फायदा उठाया जा सकता है। मस्क का विचार है कि भविष्य में सौर ऊर्जा से संचालित अत्याधुनिक सैटेलाइट्स पृथ्वी तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा में बेहद छोटे बदलाव कर सकें।
सैद्धांतिक रूप से ऐसी तकनीक पृथ्वी के तापमान को प्रभावित कर सकती है। लेकिन यह अभी व्यावहारिक रूप से मौजूद कोई स्थापित जलवायु नियंत्रण प्रणाली नहीं है। इसे भविष्य की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी तकनीकी अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए।
क्या सिर्फ सस्टेनेबल एनर्जी काफी नहीं?
मस्क का मानना है कि मानवता को जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और टिकाऊ ऊर्जा की ओर बढ़ने के साथ-साथ भविष्य की नई तकनीकों पर भी काम करना होगा।
उनके अनुसार, यदि मानव समुद्र तटों और वर्तमान में बसे क्षेत्रों में रहना चाहता है, तो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए तेज गति से तकनीकी समाधान विकसित करने पड़ सकते हैं।
हालांकि, जलवायु वैज्ञानिकों के नजरिए से मौजूदा जलवायु संकट का प्राथमिक समाधान ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार, ऊर्जा दक्षता बढ़ाना और बदलती जलवायु के अनुरूप अनुकूलन करना है। अंतरिक्ष आधारित सोलर जियो-इंजीनियरिंग अभी शोध और अवधारणा के स्तर की बात है।
जियो-इंजीनियरिंग पर क्यों उठते हैं सवाल?
जियो-इंजीनियरिंग का मतलब व्यापक स्तर पर पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को प्रभावित करने की कोशिश से है। इसके कुछ संभावित तरीकों पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं, लेकिन इसके साथ कई गंभीर सवाल भी जुड़े हैं।
अगर पृथ्वी तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा को बड़े पैमाने पर बदला जाए, तो इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है। बारिश के पैटर्न, कृषि, समुद्री पारिस्थितिकी और अन्य जलवायु प्रणालियों पर अप्रत्याशित प्रभाव पड़ने की आशंका को लेकर भी चर्चा होती रही है।
यही वजह है कि ऐसी तकनीक को लागू करने से पहले इसके संभावित लाभ और जोखिमों का व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी होगा।
अमेरिका की क्लाइमेट रिसर्च भी चर्चा में
मस्क की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका में जलवायु अनुसंधान और उसकी फंडिंग को लेकर बहस चल रही है। आपके दिए स्रोत के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन की ओर से आर्कटिक से जुड़े शोध और वार्षिक रिपोर्टिंग को लेकर भी बदलावों की घोषणा की गई है।
आर्कटिक दुनिया के सबसे तेजी से बदल रहे क्षेत्रों में से एक है और वहां होने वाले तापमान तथा बर्फ से जुड़े बदलावों का प्रभाव वैश्विक जलवायु व्यवस्था पर पड़ सकता है।

