नई दिल्ली/मुंबई। महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से जुड़े हिंदी भाषा परीक्षा के नियम को लेकर बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने हिंदी भाषा परीक्षा की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन वृद्धि या पदोन्नति के लिए हिंदी भाषा परीक्षा पास करना अनिवार्य नहीं होगा।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित किए जाने को लेकर राज्य में विरोध के स्वर उठे थे। परीक्षा की घोषणा के बाद ही इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई थी। अब महाराष्ट्र के मराठी भाषा विभाग की ओर से जारी सरकारी आदेश के बाद परीक्षा से संबंधित पुराने आदेशों को भी अमान्य कर दिया गया है।
चर्चा में कैसे आया हिंदी परीक्षा का मुद्दा?
महाराष्ट्र में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा आयोजित करने की तैयारी की जा रही थी। भाषा संचालनालय की ओर से परीक्षा आयोजित किए जाने की घोषणा की गई थी और इसके लिए 28 जून की तारीख निर्धारित की गई थी।
लेकिन परीक्षा की घोषणा के बाद ही राज्य में इसका विरोध शुरू हो गया। सवाल उठने लगा कि महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा को अनिवार्य बनाए रखने की जरूरत आखिर क्यों है।
विरोध और प्रशासनिक स्तर पर हिंदी के सीमित इस्तेमाल के बीच सरकार ने इस पूरे मामले की समीक्षा की। इसके बाद हिंदी भाषा परीक्षा को समाप्त करने का फैसला लिया गया।
आखिर सरकार ने क्यों खत्म की परीक्षा?
सरकार के फैसले के पीछे सबसे महत्वपूर्ण वजह सरकारी कामकाज में हिंदी भाषा का सीमित इस्तेमाल बताया गया है। महाराष्ट्र सरकार के अनुसार राज्य के प्रशासनिक कामकाज में मराठी भाषा का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
वहीं, महाराष्ट्र सरकार को दूसरे राज्यों या केंद्र से जुड़े औपचारिक प्रशासनिक पत्राचार के लिए अंग्रेजी भाषा का भी व्यापक इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में सरकारी कामकाज में हिंदी के इस्तेमाल की आवश्यकता पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।
इसी आधार पर सरकार ने माना कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा को अनिवार्य बनाए रखने का औचित्य अब पहले जैसा नहीं रह गया है।

प्रमोशन और वेतन वृद्धि पर क्या होगा असर?
हिंदी परीक्षा खत्म किए जाने का सबसे बड़ा असर सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर पड़ेगा। पहले जिन परिस्थितियों में हिंदी भाषा परीक्षा को वेतन वृद्धि या पदोन्नति से जोड़ा गया था, अब उस अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है।
यानी कर्मचारियों को अपने करियर में आगे बढ़ने या वेतन संबंधी लाभ हासिल करने के लिए हिंदी भाषा परीक्षा पास करने की बाध्यता नहीं रहेगी।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि महाराष्ट्र सरकार में हिंदी भाषा का इस्तेमाल पूरी तरह बंद हो जाएगा। फैसला मुख्य रूप से अनिवार्य परीक्षा और उससे जुड़ी सेवा शर्तों को समाप्त करने से संबंधित है।
31 अगस्त को जारी हुआ सरकारी आदेश
महाराष्ट्र के मराठी भाषा विभाग ने इस संबंध में 31 अगस्त को सरकारी आदेश जारी किया। इस आदेश के जरिए हिंदी भाषा परीक्षा से संबंधित व्यवस्था को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया गया।
सरकार ने सिर्फ मौजूदा परीक्षा को रद नहीं किया, बल्कि इससे जुड़े पुराने आदेशों और शासनादेशों को भी अमान्य घोषित कर दिया है। इसका मतलब है कि हिंदी भाषा परीक्षा से संबंधित पहले जारी किए गए निर्देश अब प्रभावी नहीं रहेंगे।
इस फैसले के बाद सरकारी कर्मचारियों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि हिंदी भाषा परीक्षा अब उनकी पदोन्नति या वेतन वृद्धि के लिए अनिवार्य शर्त नहीं रहेगी।
मराठी भाषा को लेकर क्या संदेश?
महाराष्ट्र की प्रशासनिक व्यवस्था में मराठी भाषा की भूमिका पहले से महत्वपूर्ण रही है। सरकारी कामकाज में मराठी के इस्तेमाल को प्राथमिकता दिए जाने के बीच सरकार का यह निर्णय भाषा नीति को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दूसरी ओर, अंतरराज्यीय और केंद्र से जुड़े औपचारिक पत्राचार में अंग्रेजी के इस्तेमाल का हवाला देते हुए सरकार ने हिंदी परीक्षा की उपयोगिता पर भी सवाल खड़ा किया है।
इस फैसले ने एक बार फिर सरकारी कामकाज में भाषा के इस्तेमाल और कर्मचारियों की सेवा शर्तों के बीच संबंध को चर्चा में ला दिया है।
कर्मचारियों के लिए क्या बदला?
सीधे शब्दों में समझें तो महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले के बाद सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए हिंदी भाषा परीक्षा की अनिवार्यता खत्म हो गई है। अब हिंदी परीक्षा को प्रमोशन और वेतन वृद्धि की अनिवार्य शर्त के तौर पर नहीं रखा जाएगा।
परीक्षा से जुड़े पुराने शासनादेश भी रद किए जाने के कारण भविष्य में इस व्यवस्था को लेकर भ्रम की स्थिति भी कम होने की उम्मीद है।

