Supreme Court News: सरकारी स्कूलों की व्यवस्था, बुनियादी सुविधाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा एक अहम मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन शीर्ष अदालत ने इस पर सुनवाई से इनकार कर दिया। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की एंट्री, फोटो-वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू और लाइवस्ट्रीमिंग के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।
यह मामला ऐसे समय सामने आया, जब सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को सामने लाने के लिए ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान भी चर्चा में था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के रुख ने इस पूरे विवाद को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से राजस्थान और उत्तर प्रदेश में जारी उन प्रशासनिक आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और विभिन्न प्रकार की रिकॉर्डिंग के लिए पहले से अनुमति लेने की शर्त रखी गई थी।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस रिट याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं है। इसका मतलब यह है कि इस याचिका के जरिए मांगी गई राहत पर सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ाई।
याचिका में क्या मांग की गई थी?
याचिकाकर्ता प्रिया मिश्रा ने अदालत से राजस्थान और उत्तर प्रदेश में जारी संबंधित आदेशों को उस सीमा तक रद्द करने की मांग की थी, जहां उनके अनुसार सार्वजनिक हित में दस्तावेजीकरण पर व्यापक रोक लगती है।
याचिका में यह भी मांग रखी गई थी कि सार्वजनिक हित से जुड़े दस्तावेजीकरण को नियंत्रित करने वाले नियम तर्कसंगतता, आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि सरकारी स्कूल सार्वजनिक संस्थान हैं और वहां उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को सार्वजनिक हित में रिकॉर्ड करना कई परिस्थितियों में महत्वपूर्ण हो सकता है।

राजस्थान में क्या है नियम?
याचिका में राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से 16 अगस्त 2026 को जारी सर्कुलर का उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक सरकारी स्कूल में किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश के लिए प्रधानाचार्य से पहले अनुमति लेना जरूरी किया गया है।
इसके अलावा स्कूल परिसर में फोटो खींचने, वीडियो बनाने, इंटरव्यू करने, ऑडियो रिकॉर्ड करने और लाइवस्ट्रीमिंग के लिए भी पूर्व लिखित अनुमति की व्यवस्था का हवाला याचिका में दिया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य स्कूलों में अनधिकृत गतिविधियों को नियंत्रित करना और बच्चों तथा स्कूल परिसर की सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है, जबकि याचिकाकर्ता ने इसे सार्वजनिक निगरानी और दस्तावेजीकरण के अधिकार से जोड़कर चुनौती दी थी।
उत्तर प्रदेश में भी बाहरी लोगों पर रोक
याचिका में उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से 19 अगस्त को जारी आदेश का भी उल्लेख किया गया है।
इस आदेश में बाहरी लोगों, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया से जुड़े व्यक्तियों को सक्षम अधिकारी की अनुमति के बिना परिषद के स्कूलों में प्रवेश करने अथवा फोटो-वीडियो बनाने से रोकने का निर्देश दिए जाने की बात कही गई है।
याचिका के अनुसार आजमगढ़, बलिया, बस्ती, बलरामपुर, शामली और आगरा सहित कुछ अन्य जिलों में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए थे।
बच्चों की सुरक्षा बनाम सार्वजनिक निगरानी
इस मामले का सबसे अहम पहलू बच्चों की निजता, गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा है। याचिका में भी माना गया कि बच्चों की पहचान योग्य तस्वीरों या वीडियो को बिना अनुमति रिकॉर्ड करने पर रोक लगाने के लिए उचित नियम जरूरी हो सकते हैं।
लेकिन याचिकाकर्ता ने स्कूल के बुनियादी ढांचे की स्थिति और बच्चों की पहचान वाली सामग्री के बीच अंतर करने की मांग की।
याचिका में उदाहरण देते हुए कहा गया कि स्कूल भवन, कक्षाओं, शौचालयों, पेयजल, बिजली, मिड-डे मील और अन्य बुनियादी सुविधाओं की सार्वजनिक हित में पड़ताल को बच्चों की निजता से जुड़े नियमों के समान नहीं माना जाना चाहिए।
किन मौलिक अधिकारों का दिया गया हवाला?
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इन प्रतिबंधों का असर संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(ए), 19(1)(जी), 21 और 21-ए के तहत मिलने वाले अधिकारों पर पड़ सकता है।
विशेष रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए कहा गया कि वैध पत्रकारिता और सार्वजनिक संस्थानों से संबंधित सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
हालांकि, इन दलीलों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के बीच क्यों बढ़ी चर्चा?
यह विवाद इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि इसी दौरान सरकारी स्कूलों की कमियों और बुनियादी सुविधाओं को लेकर ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाए जाने की बात सामने आई।
अभियान का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं की स्थिति को सार्वजनिक चर्चा में लाना बताया गया। ऐसे में स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियो पर अनुमति की शर्त को लेकर बहस तेज हुई।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद संबंधित राज्यों के प्रशासनिक आदेश अपनी जगह बने हुए हैं। आगे इस विषय पर कोई अन्य कानूनी चुनौती या वैकल्पिक न्यायिक रास्ता अपनाया जाता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।

