सऊदी अरब: और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने रियाद के समर्थन को लेकर अपना रुख और स्पष्ट कर दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने कहा है कि सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान की सैन्य क्षमताएं उपलब्ध रहेंगी। उनका बयान ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब पर हूतियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों को लेकर क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा है।
आसिफ ने हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया कि पाकिस्तानी सेना ने हाल में सऊदी अरब की ओर से या उसके साथ मिलकर किसी हवाई हमले में हिस्सा लिया है या नहीं। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान से किसी खास सैन्य सहायता का औपचारिक अनुरोध किया है या नहीं। यही वजह है कि उनके बयान को पाकिस्तान की सैन्य प्रतिबद्धता की पुष्टि के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन इसे पाकिस्तानी सैनिकों की प्रत्यक्ष युद्ध में भागीदारी की पुष्टि नहीं माना जा सकता।
क्या है पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये का नया रक्षा समझौता?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त 2026 को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक सुरक्षा सहयोग की व्यवस्था बनाई है। इसका उद्देश्य किसी सदस्य देश पर होने वाले हमले की स्थिति में दूसरे सदस्य देशों के समर्थन को मजबूत करना है।
हाल के हूती हमलों ने इस समझौते की वास्तविक उपयोगिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। सितंबर में पाकिस्तान की ओर से कई बार कहा गया कि यदि सऊदी अरब पर हमले बढ़ते हैं तो समझौते के प्रावधान सक्रिय हो सकते हैं।
हूतियों के हमलों से बढ़ा तनाव
यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन हालिया घटनाओं ने स्थिति को एक बार फिर संवेदनशील बना दिया है। हूतियों की ओर से सऊदी क्षेत्र को निशाना बनाकर मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं।
सितंबर में मक्का के आसपास ड्रोन को लेकर भी विवाद सामने आया। सऊदी पक्ष ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा ने मक्का की ओर बढ़ रहे ड्रोन को रोक दिया था, जबकि हूतियों ने इस आरोप को खारिज किया। इस घटना के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ खड़े होने की बात कही थी।
तुर्किये ने भी सऊदी अरब की रक्षा जरूरतों को पूरा करने की इच्छा जताई है। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा था कि सऊदी अरब को विशेष रूप से तकनीकी सैन्य सहायता की जरूरत हो सकती है और अंकारा उसे उपलब्ध कराने के लिए तैयार है।

क्या पाकिस्तान सीधे युद्ध में उतरेगा?
यही सवाल इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। ख्वाजा आसिफ ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान की सैन्य क्षमताएं उपलब्ध होने की बात कही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि पाकिस्तानी सैनिक पहले से हूतियों के खिलाफ किसी अभियान में शामिल हैं।
उन्होंने हालिया हवाई हमलों में पाकिस्तान की संभावित भागीदारी के सवाल पर सीधे पुष्टि नहीं की। इसलिए फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर पाकिस्तान की सैन्य सहायता की प्रतिबद्धता और पाकिस्तानी सेना की प्रत्यक्ष युद्ध भागीदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है।
पाकिस्तान पहले भी कह चुका है कि अगर सऊदी अरब के खिलाफ स्थिति और बिगड़ती है तो वह राजनीतिक, कूटनीतिक और व्यावहारिक स्तर पर रियाद के साथ खड़ा रहेगा। सितंबर के मध्य में आसिफ ने कहा था कि हालात बिगड़ने पर पाकिस्तान सऊदी अरब का व्यावहारिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर समर्थन करेगा।
ईरान का मुद्दा भी महत्वपूर्ण
इस पूरे घटनाक्रम में ईरान की भूमिका भी संवेदनशील है। हूतियों को ईरान का समर्थन मिलने की बात लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है, हालांकि तेहरान हूतियों के सैन्य अभियानों को सीधे नियंत्रित करने से इनकार करता है।
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए जटिल है क्योंकि एक तरफ उसके सऊदी अरब के साथ सुरक्षा और आर्थिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ वह ईरान के साथ भी राजनयिक संबंध बनाए रखना चाहता है। ख्वाजा आसिफ ने भी संकेत दिया है कि पाकिस्तान सैन्य प्रतिबद्धताओं के साथ-साथ क्षेत्रीय बातचीत और कूटनीतिक समाधान के रास्ते को खुला रखना चाहता है।
नया रक्षा गठबंधन पहली बड़ी परीक्षा में
मक्का रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही सप्ताह बाद सऊदी अरब पर हूती हमलों ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये की नई सुरक्षा व्यवस्था को शुरुआती बड़ी परीक्षा के सामने ला दिया है।
तीनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच हाल में बैठक भी हुई है, जिसमें हूती हमलों के जवाब और आपसी समन्वय पर चर्चा हुई। हालांकि गठबंधन की पूरी परिचालन व्यवस्था अभी विकसित की जा रही है और इसके कमांड तथा संचालन ढांचे से जुड़ी कई जानकारियां सार्वजनिक नहीं हैं।
इसलिए आने वाले दिनों में सबसे अहम सवाल यह रहेगा कि सऊदी अरब पर हमले और बढ़ते हैं तो पाकिस्तान और तुर्किये अपनी रक्षा प्रतिबद्धताओं को किस रूप में लागू करते हैं—सैन्य उपकरण, खुफिया सहयोग, एयर डिफेंस, लॉजिस्टिक सहायता या प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई के रूप में।

