भोपाल/पन्ना: मध्य प्रदेश में सामाजिक कार्यकर्ता और नगर पार्षद दिव्या अहिरवार इन दिनों चर्चा में हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना और अन्य बांध परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलन में उनकी भूमिका अहम रही है। सितंबर 2026 से जेल में बंद दिव्या ने जमानत लेने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि वह जेल के भीतर से ही प्रभावित परिवारों के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगी। उनके इस फैसले के बाद विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास से जुड़ा मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है।
कौन हैं दिव्या अहिरवार?
दिव्या अहिरवार मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के बिजावर की नगर पार्षद हैं और कानून की पढ़ाई भी कर रही हैं। जनसत्ता की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय के बच्चों की शिक्षा में मदद करने के लिए मुफ्त कोचिंग की व्यवस्था की थी।
दिव्या के पिता का निधन 2013 में हुआ था, जब वह दसवीं कक्षा में पढ़ रही थीं। उनकी मां मजदूरी करती हैं। सामाजिक मुद्दों से जुड़ते हुए दिव्या ने स्थानीय समस्याओं को उठाना शुरू किया और बाद में विस्थापित परिवारों के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
उन्होंने पहले आम आदमी पार्टी से भी जुड़कर काम किया था, लेकिन बाद में पार्टी छोड़ दी। सार्वजनिक जीवन में उनकी पहचान एक स्थानीय जनप्रतिनिधि और आंदोलनकारी के रूप में बनी।
कैसे जुड़ीं चिता आंदोलन से?
दिव्या अहिरवार 26 जनवरी 2022 को संविधान बचाओ पदयात्रा के दौरान इस आंदोलन से जुड़ी थीं। समय के साथ उनकी सक्रियता उन परिवारों के बीच बढ़ी, जो बांध और दूसरी विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापन की आशंका या समस्या का सामना कर रहे थे।
आंदोलन का एक प्रमुख मुद्दा केन-बेतवा लिंक परियोजना और मझगवां बांध समेत अन्य परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास उपलब्ध कराना है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि कुछ परिवारों को सर्वे में शामिल नहीं किया गया या उनके मुआवजे और पुनर्वास से जुड़े दावों का पूरा निपटारा किए बिना बेदखली की कार्रवाई हुई।
दिव्या ने गांवों में जाकर लोगों से संवाद किया, महिलाओं को आंदोलन से जोड़ा और सोशल मीडिया के माध्यम से भी मुद्दों को सामने रखने में मदद की। आंदोलन के प्रमुख नेता अमित भटनागर की गिरफ्तारी के बाद उनकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई।

सितंबर से जेल में क्यों बंद हैं दिव्या?
दिव्या अहिरवार को सितंबर 2026 में आंदोलन से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाओं के मामले में उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया। इनमें हत्या के प्रयास से संबंधित आरोप भी शामिल बताए गए हैं।
दूसरी ओर, आंदोलन से जुड़े लोगों और दिव्या ने आरोप लगाया है कि प्रभावित किसानों और आदिवासी परिवारों के अधिकारों की आवाज उठाने के कारण उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के तरीके और पुलिस हिरासत में कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
इन आरोपों और पुलिस के दावों के बीच मामले की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। आरोप दर्ज होना अपने आप में दोष साबित होना नहीं है। मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत की प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकलेगा।
जमानत लेने से इनकार कर चर्चा में आईं
27 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व राज्यसभा सांसद और माकपा नेता वृंदा करात तथा आंदोलन से जुड़े अमित भटनागर ने पन्ना जिला जेल में दिव्या अहिरवार से मुलाकात की। इस दौरान दिव्या ने जमानत लेने से इनकार करते हुए जेल से ही संघर्ष जारी रखने की बात कही।
अमित भटनागर ने कहा कि उन्होंने दिव्या को जमानत लेने की सलाह दी है और आगे हाईकोर्ट का रुख करने की योजना है। इस घटनाक्रम ने आंदोलन को नया राजनीतिक और सामाजिक समर्थन दिया है।
हालांकि, जमानत से इनकार करने का उनका फैसला व्यक्तिगत और कानूनी परिस्थितियों से जुड़ा है। आगे की कार्रवाई अदालत में होने वाली सुनवाई और संबंधित पक्षों के कदमों पर निर्भर करेगी।
विस्थापन और मुआवजे का विवाद क्या है?
केन-बेतवा लिंक परियोजना का उद्देश्य केन नदी के अतिरिक्त जल को बेतवा नदी के क्षेत्र तक पहुंचाकर सिंचाई और जल उपलब्धता में मदद करना है। इसके साथ ही परियोजना और संबंधित बांधों से प्रभावित क्षेत्रों में विस्थापन, जमीन, मकान, मुआवजा तथा पुनर्वास जैसे सवाल भी उठते रहे हैं।
आंदोलनकारी परिवारों की मांग है कि पात्र लोगों को उचित मुआवजा मिले, पुनर्वास की व्यवस्था हो और जिन परिवारों के दावे लंबित हैं, उनकी शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा किया जाए। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के साथ प्रभावित समुदायों के अधिकारों की रक्षा भी जरूरी है।
प्रशासन और परियोजना से संबंधित अधिकारियों का पक्ष, पुनर्वास के रिकॉर्ड और अदालत में चल रही प्रक्रिया इस विवाद को समझने के लिए अहम हैं। किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम तथ्य मानने से पहले उनकी पुष्टि जरूरी है।
राजनीतिक नेताओं ने भी उठाया मामला
दिव्या की गिरफ्तारी और विस्थापित परिवारों की मांगों को लेकर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं। माकपा नेता वृंदा करात ने पन्ना पहुंचकर आंदोलन को समर्थन दिया। कांग्रेस नेताओं ने भी प्रभावित परिवारों के मुआवजे, पुनर्वास और आंदोलनकारियों पर दर्ज मामलों को लेकर सरकार की आलोचना की है।
इससे स्थानीय स्तर पर चल रहा विरोध व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। अब इस मामले में सबकी नजर आंदोलन की आगे की रणनीति, दिव्या की कानूनी स्थिति और प्रभावित परिवारों की मांगों पर प्रशासन की प्रतिक्रिया पर है।

