नई दिल्ली: दक्षिण दिल्ली के सैदुल्लाजाब इलाके में शनिवार शाम हुए दर्दनाक भवन हादसे ने राजधानी में अवैध निर्माण और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साकेत के पास स्थित इस इलाके में एक छह मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई जबकि एक दर्जन से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका के बीच देर रात तक राहत एवं बचाव अभियान जारी रहा।
लेकिन इस हादसे से भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक चार मंजिला इमारत कुछ ही वर्षों में छह मंजिल तक कैसे पहुंच गई और सातवीं मंजिल का निर्माण शुरू होने तक किसी विभाग की नजर उस पर क्यों नहीं पड़ी?
सातवीं मंजिल का लिंटर डालने की तैयारी, तभी मचा कोहराम
स्थानीय लोगों के अनुसार, हादसे के समय इमारत की सातवीं मंजिल पर छत का लिंटर डालने की तैयारी चल रही थी। करीब 25 से 30 मजदूर निर्माण कार्य में लगे हुए थे। इसी दौरान अचानक पूरी इमारत कांपने लगी और देखते ही देखते जमीन पर आ गिरी।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पहले जोरदार कंपन महसूस हुआ, फिर धूल का विशाल गुबार उठा और कुछ ही सेकंड में पूरी संरचना मलबे में तब्दील हो गई। हादसे के बाद इलाके में चीख-पुकार मच गई।
चार मंजिल से छह मंजिल तक पहुंची इमारत
स्थानीय निवासियों का दावा है कि करीब चार साल पहले यह भवन केवल चार मंजिला था। इसके बाद धीरे-धीरे अतिरिक्त मंजिलें जोड़ी गईं और इमारत को छह मंजिल तक पहुंचा दिया गया।
बताया जा रहा है कि सातवीं मंजिल का निर्माण भी जारी था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि निर्माण कार्य के दौरान क्षेत्रीय भवन विभाग, नगर निगम और इंजीनियरिंग विंग की निगरानी आखिर कहां थी।
निर्माण सामग्री की लगातार आवाजाही, मजदूरों की मौजूदगी और लंबे समय से चल रहे निर्माण कार्य के बावजूद यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो यह प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला माना जा रहा है।

हादसे में तीन की मौत, कई घायल
अधिकारियों के अनुसार हादसे में अब तक तीन लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। वहीं लगभग 12 लोग घायल हुए हैं, जिनमें कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है।
घायलों को दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जिनमें मैक्स अस्पताल, एम्स और सफदरजंग अस्पताल शामिल हैं।
एनडीआरएफ और दमकल की टीमों ने संभाला मोर्चा
दिल्ली अग्निशमन सेवा को शाम करीब 7:45 बजे घटना की सूचना मिली। शुरुआत में चार दमकल गाड़ियों को मौके पर भेजा गया, लेकिन स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त संसाधन तैनात किए गए।
राहत अभियान में एनडीआरएफ, दिल्ली पुलिस, एमसीडी और खोजी कुत्तों की विशेष टीमों को लगाया गया। स्थानीय लोगों ने भी शुरुआती दौर में मलबे से कुछ लोगों को सुरक्षित निकालने में मदद की।
पूरे इलाके को सुरक्षा घेरे में लेकर राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर चलाया गया।
व्यावसायिक गतिविधियों का था केंद्र
स्थानीय कमेटी के प्रतिनिधियों के अनुसार इमारत में विभिन्न प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही थीं। भवन में कैफे, कॉफी हाउस, कोचिंग सेंटर, पीजी और कैंटीन जैसी सुविधाएं मौजूद थीं।
हादसे के समय कैंटीन में छात्रों के मौजूद होने की भी जानकारी सामने आई है। इसी वजह से मलबे में अधिक लोगों के दबे होने की आशंका जताई गई।
निगरानी तंत्र पर उठे सवाल
दिल्ली में यह पहला मामला नहीं है जब अवैध निर्माण के कारण बड़ा हादसा हुआ हो। इससे पहले भी कई इमारतें गिरने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्वीकृत नक्शे, संरचनात्मक परीक्षण और लोड क्षमता का आकलन किए अतिरिक्त मंजिलें जोड़ना बेहद खतरनाक होता है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि भवन लगातार ऊंचा होता जा रहा था तो संबंधित अधिकारियों ने समय रहते निरीक्षण क्यों नहीं किया? क्या शिकायतें नजरअंदाज की गईं या फिर निगरानी व्यवस्था पूरी तरह विफल रही?
जांच के बाद सामने आएगी सच्चाई
हादसे के बाद प्रशासन ने जांच के संकेत दिए हैं। संभावना है कि भवन स्वीकृति, निर्माण मानकों और अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाएगी।
यदि निर्माण अवैध पाया जाता है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
सैदुल्लाजाब भवन हादसा केवल एक निर्माण दुर्घटना नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाली घटना बन गया है। तीन लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने के बाद अब लोगों की नजर जांच एजेंसियों पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चार मंजिला इमारत छह मंजिल तक और फिर सातवीं मंजिल के निर्माण तक पहुंच गई, लेकिन जिम्मेदार विभागों को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी?