भारत बाल-बाल बचा! अमेरिका का सबसे खतरनाक F-35 जेट निकला ‘धोखा’, 4 में 3 उड़ने लायक नहीं

अमेरिका: की हवाई ताकत की पहचान माने जाने वाले F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। दुनिया के सबसे एडवांस और सबसे महंगे लड़ाकू विमानों में गिने जाने वाले इस जेट की ऑपरेशनल तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अमेरिकी सरकार की ऑडिट एजेंसी Government Accountability Office (GAO) की जून 2026 की रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि वित्त वर्ष 2025 में अमेरिकी F-35 बेड़े का Full Mission Capable Rate घटकर सिर्फ 25% रह गया। यानी हर 4 में से केवल 1 जेट ही अपनी सभी तय युद्ध भूमिकाओं—हवाई लड़ाई, बमबारी, निगरानी और जासूसी—को पूरी तरह निभाने की स्थिति में था।

इस खुलासे ने न केवल अमेरिका की सैन्य तैयारी पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि भारत में भी इस जेट को लेकर बहस तेज कर दी है। वजह यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत को F-35 ऑफर कर चुके थे। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत ने इस सौदे से दूरी बनाकर एक बड़ी रणनीतिक और आर्थिक मुश्किल टाल दी?

4 में 3 F-35 पूरी तरह लड़ाई के लिए तैयार नहीं

GAO रिपोर्ट के अनुसार, F-35 का Mission Capable Rate—यानी कम से कम एक मिशन करने की क्षमता—भी गिरकर 44% रह गया, जो 2021 में 67% था। वहीं Full Mission Capable Rate 2021 के 38% से गिरकर 2025 में 25% पर आ गया। इसका मतलब साफ है: अमेरिकी सेना के पास बड़ी संख्या में जेट मौजूद तो हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर किसी बड़े युद्ध की स्थिति में पूरी क्षमता से काम करने की हालत में नहीं हैं।

रिपोर्ट बताती है कि समस्या केवल एक तकनीकी खराबी की नहीं है। इसके पीछे स्पेयर पार्ट्स की कमी, मेंटेनेंस में देरी, सॉफ्टवेयर अपग्रेड की दिक्कतें, कॉन्ट्रैक्टर पर अत्यधिक निर्भरता और कॉरोजन जैसी तकनीकी समस्याएं शामिल हैं। कई जेट पुर्जों के इंतजार में लंबे समय तक हैंगर में खड़े रहते हैं।

13.7 अरब डॉलर का ‘रिसेट प्लान’, फिर भी खतरा बरकरार

F-35 की गिरती तैयारी को सुधारने के लिए अमेरिकी रक्षा विभाग ने Global Support Solution Reset नाम से एक नई रणनीति शुरू की है। GAO के मुताबिक इस योजना को 2031 तक लागू करने के लिए पहले से तय खर्च के मुकाबले 13.7 अरब डॉलर अतिरिक्त चाहिए होंगे। लेकिन रिपोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि इस योजना की सफलता पर खुद कई खतरे मंडरा रहे हैं—जैसे उद्योग जगत की सीमित क्षमता, सप्लाई चेन की कमजोरी और फंडिंग गैप।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2020 से कॉन्ट्रैक्टर्स को सैकड़ों मिलियन डॉलर के इंसेंटिव दिए गए, लेकिन उससे जमीनी सुधार उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ। यानी समस्या केवल पैसे की नहीं, बल्कि सिस्टम की है।

अमेरिका के लिए क्यों खतरनाक है यह संकट?

F-35 सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि अमेरिकी वायुशक्ति का केंद्रीय स्तंभ माना जाता है। इसे दुश्मन की एयर डिफेंस को भेदने, स्टील्थ स्ट्राइक करने, सेंसर नेटवर्किंग और मल्टी-रोल ऑपरेशन के लिए बनाया गया है। ऐसे में जब इसी जेट की उपलब्धता घटती है, तो अमेरिका की युद्ध तैयारी पर सीधा असर पड़ता है।

रिपोर्ट और रक्षा विश्लेषणों में यह चिंता जताई गई है कि अगर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बड़ा सैन्य संकट खड़ा होता है—जैसे ताइवान को लेकर चीन के साथ तनाव—तो F-35 की कम उपलब्धता अमेरिका की प्रतिक्रिया क्षमता को कमजोर कर सकती है। खासकर इसलिए क्योंकि F-35 को अमेरिकी फाइटर फोर्स का भविष्य माना जाता है।

भारत के लिए क्या सबक?

भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट इसलिए अहम है क्योंकि F-35 को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को F-35 देने का संकेत दिया था, लेकिन भारत ने अब तक कोई आधिकारिक रुचि नहीं दिखाई। भारत की प्राथमिक चिंता सिर्फ कीमत नहीं, बल्कि लंबी अवधि की रणनीतिक निर्भरता, मेंटेनेंस सपोर्ट, स्पेयर पार्ट्स सप्लाई, सॉफ्टवेयर नियंत्रण और ऑपरेशनल स्वायत्तता जैसे मुद्दे रहे हैं।

अब जब अमेरिकी ऑडिट रिपोर्ट खुद यह बता रही है कि अमेरिका जैसे संसाधन-संपन्न देश को भी F-35 की उपलब्धता बनाए रखने में दिक्कत हो रही है, तो भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है। कोई भी फाइटर जेट सिर्फ खरीदने से उपयोगी नहीं बनता; उसकी असली ताकत उसके मेंटेनेंस इकोसिस्टम, लाइफ-साइकल कॉस्ट, स्पेयर सपोर्ट और युद्ध के समय उपलब्धता में छिपी होती है।

क्या F-35 ‘कबाड़’ है?

यह कहना सही नहीं होगा कि F-35 एक ‘कबाड़’ विमान है। तकनीकी क्षमता, स्टील्थ, सेंसर फ्यूजन और मल्टी-रोल मिशन प्रोफाइल के मामले में यह अब भी दुनिया के सबसे उन्नत फाइटर प्लेटफॉर्म्स में गिना जाता है। लेकिन ताजा रिपोर्ट यह जरूर दिखाती है कि कागज पर शानदार दिखने वाला प्लेटफॉर्म, जमीनी ऑपरेशन में उतना ही सफल हो—यह जरूरी नहीं। अगर विमान समय पर उड़ ही न पाए, तो उसकी तकनीकी श्रेष्ठता का लाभ सीमित हो जाता है।

F-35 को लेकर आई GAO रिपोर्ट ने अमेरिकी रक्षा व्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी उजागर कर दी है। दुनिया का सबसे महंगा स्टील्थ फाइटर होने के बावजूद इसकी ऑपरेशनल उपलब्धता चिंताजनक स्तर तक गिर गई है। भारत के लिए यह रिपोर्ट एक अहम रणनीतिक सबक है—किसी भी रक्षा सौदे में केवल तकनीक नहीं, बल्कि रखरखाव, लागत, उपलब्धता और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता सबसे बड़े पैमाने होने चाहिए।

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