‘53% लोग खाते हैं नॉनवेज, फिर मेन्यू से गायब क्यों?’ ओवैसी ने योगी सरकार की ‘एक जनपद एक व्यंजन’ योजना पर उठाए तीखे सवाल

उत्तर प्रदेश: सरकार की महत्वाकांक्षी ‘एक जनपद एक व्यंजन’ (ODOD) योजना अब राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। राज्य सरकार जहां 75 जिलों के पारंपरिक व्यंजनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की तैयारी में जुटी है, वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस योजना को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

विवाद की वजह यह है कि सरकार द्वारा तैयार की गई लगभग 200 व्यंजनों की सूची में एक भी मांसाहारी (नॉनवेज) डिश को शामिल नहीं किया गया है। ओवैसी का कहना है कि जब सरकारी आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी भोजन करते हैं, तो फिर राज्य की खाद्य पहचान में नॉनवेज व्यंजनों को जगह क्यों नहीं दी गई।

क्या है ‘एक जनपद एक व्यंजन’ योजना?

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के प्रत्येक जिले के विशेष और पारंपरिक व्यंजनों की पहचान कर उन्हें ब्रांड के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य स्थानीय खानपान संस्कृति को बढ़ावा देना, पर्यटन को प्रोत्साहित करना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है।

योजना के तहत जौनपुर का एटम बम, वाराणसी की लस्सी, मेरठ की रेवड़ी और गजक, लखनऊ का मलाई मक्खन सहित कई लोकप्रिय व्यंजनों को सूची में शामिल किया गया है। सरकार इन उत्पादों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और सप्लाई चेन विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

ओवैसी को किस बात पर है आपत्ति?

तेलंगाना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 75 जिलों के 200 व्यंजनों की सूची बनाई है, लेकिन उसमें गोश्त आधारित एक भी डिश शामिल नहीं है।

उन्होंने दावा किया कि सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार राज्य में लगभग 53 प्रतिशत लोग मांसाहारी भोजन करते हैं। ऐसे में केवल शाकाहारी व्यंजनों को बढ़ावा देना राज्य की वास्तविक खाद्य संस्कृति को पूरी तरह प्रस्तुत नहीं करता।

ओवैसी ने कहा कि उत्तर प्रदेश और विशेषकर लखनऊ की पहचान केवल शाकाहारी व्यंजनों से नहीं है। यहां की बिरयानी, कबाब, निहारी और अन्य पारंपरिक मांसाहारी डिश भी विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।

लखनऊ की खाद्य विरासत पर भी उठाया सवाल

अपने भाषण में ओवैसी ने लखनऊ की खानपान संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शहर को उसकी समृद्ध खाद्य विरासत के लिए जाना जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी प्रचार सामग्री में केवल शाकाहारी व्यंजनों को प्रमुखता दी जा रही है जबकि प्रदेश की बहुआयामी खाद्य संस्कृति को नजरअंदाज किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य की सांस्कृतिक पहचान उसके विविध खानपान से बनती है और उसमें सभी समुदायों की परंपराओं को स्थान मिलना चाहिए।

सरकार का क्या है उद्देश्य?

राज्य सरकार का कहना है कि ‘टेस्ट ऑफ यूपी’ अभियान के माध्यम से स्थानीय व्यंजनों को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य छोटे कारोबारियों, स्थानीय खाद्य उद्योग और पारंपरिक उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराना है।

सरकार का मानना है कि इससे पर्यटन, स्वरोजगार और खाद्य उद्योग को नई गति मिलेगी। हालांकि सरकार की ओर से अब तक नॉनवेज व्यंजनों को सूची में शामिल न किए जाने पर कोई विशेष आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल खानपान तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक और वोट बैंक समूहों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

ओवैसी का यह बयान भी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। वे खाद्य संस्कृति और पहचान के मुद्दे के जरिए उन वर्गों तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहते हैं जो इस विषय को अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जोड़कर देखते हैं।

आगे क्या?

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आलोचना पर कोई प्रतिक्रिया देती है या नहीं। साथ ही यह बहस भी तेज हो सकती है कि किसी राज्य की खाद्य पहचान को प्रस्तुत करते समय क्या केवल एक प्रकार के व्यंजनों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए या सभी परंपराओं को समान स्थान मिलना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *