नई दिल्ली। रूस के ऊर्जा कारोबार पर पश्चिमी देशों का दबाव लगातार बढ़ने के बावजूद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में कमी करने के बजाय इसे और बढ़ा दिया है। जुलाई 2026 में भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात लगातार दूसरे महीने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने जुलाई में करीब 5.5 अरब यूरो मूल्य का रूसी कच्चा तेल खरीदा।
जून की तुलना में जुलाई में खरीद में करीब 2.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2.1 प्रतिशत का आंकड़ा मात्रा से संबंधित है, न कि तेल के कुल मूल्य में वृद्धि से।
जुलाई में कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी कितनी रही?
जुलाई में भारतीय रिफाइनरियों ने प्रतिदिन करीब 28 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा। यह भारत के कुल पांच मिलियन बैरल प्रतिदिन से कुछ अधिक कच्चे तेल आयात का करीब 55.5 प्रतिशत था।
इस तरह रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे महत्वपूर्ण विदेशी स्रोत बना हुआ है। CREA के मुताबिक, जुलाई में रूस से भारत की कुल जीवाश्म ईंधन खरीद करीब 6.4 अरब यूरो रही। इसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी 87 प्रतिशत थी।
इसके अलावा भारत ने रूस से करीब 51.2 करोड़ यूरो का कोयला और करीब 34.1 करोड़ यूरो के तेल उत्पाद भी खरीदे।
2022 के बाद क्यों बढ़ी रूसी तेल पर निर्भरता?
भारत की रूसी तेल पर निर्भरता में सबसे बड़ा बदलाव फरवरी 2022 के बाद आया। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोप समेत पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। यूरोपीय खरीदारों की मांग घटने के बाद रूस ने एशियाई खरीदारों को आकर्षक कीमतों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराया।
भारत ने इस अवसर का इस्तेमाल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किया। सस्ते रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे माल की लागत को नियंत्रित रखने में मदद की।
अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2021 में रूस भारत को प्रतिदिन एक लाख बैरल से भी कम कच्चा तेल देता था। यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 2.5 प्रतिशत था।
इसके बाद 2022 में यह मात्रा बढ़कर करीब 7.40 लाख बैरल प्रतिदिन हो गई और 2023 में यह लगभग 18 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई। इसी दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।

2023 में 39 प्रतिशत थी हिस्सेदारी
2023 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 39 प्रतिशत थी। अब जुलाई 2026 के आंकड़ों में यह हिस्सा 55 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच गया है।
यानी कुछ वर्षों के भीतर भारत के तेल आयात में रूसी कच्चे तेल की भूमिका काफी बढ़ गई है। इसका एक प्रमुख कारण रूस द्वारा उपलब्ध कराया गया अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल और भारतीय रिफाइनिंग उद्योग की खरीद क्षमता रही है।
रूस के तेल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत
CREA के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। विश्लेषण की अवधि में रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी करीब 37 प्रतिशत रही।
चीन करीब 50 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर रहा।
भारत की खरीद में वृद्धि के बावजूद रूस की कुल जीवाश्म ईंधन से होने वाली आय पर दबाव बना हुआ है। जुलाई में रूसी कच्चे तेल से होने वाली निर्यात आय करीब 39.2 करोड़ यूरो प्रतिदिन रही, जो पिछले महीने के आसपास ही रही।
यूराल्स तेल की कीमत में भी गिरावट
CREA के अनुसार, रूस के यूराल्स कच्चे तेल की औसत कीमत जुलाई में करीब तीन प्रतिशत घटकर 60.22 डॉलर प्रति बैरल रह गई।
हालांकि, यह कीमत फरवरी 2026 में लागू जी7 और यूरोपीय संघ की 44.10 डॉलर प्रति बैरल मूल्य सीमा से काफी ऊपर रही। यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिमी देशों ने रूस के ऊर्जा कारोबार से होने वाली आय को सीमित करने के लिए मूल्य सीमा जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं।
पाइपलाइन से आय घटी, समुद्री निर्यात ने संभाला मोर्चा
रूस के ऊर्जा निर्यात के आंकड़ों में एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। जुलाई में पाइपलाइन के जरिए कच्चे तेल से होने वाली आय में मासिक आधार पर करीब 21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि, समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल निर्यात से प्राप्त आय में करीब 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इससे पाइपलाइन आय में आई गिरावट की कुछ भरपाई हुई।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है रूसी तेल?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अलग-अलग देशों से प्रतिस्पर्धी कीमत पर तेल खरीदना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
रूसी तेल की बढ़ती खरीद भारत को अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल का विकल्प देती है, जबकि पश्चिमी देशों के लिए यह चिंता का विषय बना हुआ है कि प्रतिबंधों के बावजूद रूस को एशियाई बाजारों से बड़ी आय प्राप्त हो रही है।
भारत की नीति का मुख्य जोर अपनी ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू जरूरतों को पूरा करने पर रहा है। यही वजह है कि पश्चिमी दबाव के बीच भी रूसी कच्चे तेल की खरीद में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पश्चिमी देशों की ओर से रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव बढ़ने के बाद भारत की खरीद रणनीति में कितना बदलाव आता है। फिलहाल जुलाई के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल से दूरी बनाने के बजाय इसकी खरीद को और मजबूत किया है।
आने वाले महीनों में तेल की कीमतें, प्रतिबंधों की शर्तें, शिपिंग लागत और भारत की ऊर्जा जरूरतें तय करेंगी कि रूस से कच्चे तेल की खरीद इसी स्तर पर बनी रहती है या इसमें बदलाव आता है।

