नई दिल्ली। NEET प्रदर्शन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर अहम आदेश जारी करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्रदर्शन से जुड़े FIR मामलों को रद्द करने का निर्देश दिया है। हालांकि, गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले आरोपियों को इस राहत से बाहर रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद NEET प्रदर्शन से जुड़े संगठन CJP ने 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित विरोध मार्च वापस लेने का फैसला किया है। संगठन ने केंद्र सरकार के सकारात्मक रुख और अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए कहा है कि अब वह प्रस्तावित मार्च नहीं निकालेगा।
इस पूरे घटनाक्रम को छात्रों और उनके परिवारों के लिए बड़ी कानूनी राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से क्या बदला?
NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों के दौरान छात्रों और अन्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थीं।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों की ओर से इन मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया पर जानकारी अदालत के सामने रखी गई।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि दिल्ली पुलिस के अलावा बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र सरकारों ने भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से संबंधित याचिकाएं दाखिल की हैं।
अदालत के आदेश के बाद अब प्रदर्शन से जुड़े मामलों को खत्म करने का रास्ता साफ हुआ है।
गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वालों पर जांच जारी
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है। गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को सामान्य राहत से अलग रखा गया है।
दिल्ली पुलिस को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल 2,873 लोगों में से गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले कुछ व्यक्तियों के खिलाफ एक FIR के संबंध में आगे जांच करने की अनुमति दी गई है।
इसका मतलब यह है कि प्रदर्शन में मौजूद हर व्यक्ति को अपराधी नहीं माना गया है। केवल उन लोगों की भूमिका की जांच की जा सकती है जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि या अन्य ठोस आधार मौजूद हैं।
अब पुलिस की जांच का उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि संबंधित लोगों की प्रदर्शन के दौरान वास्तविक भूमिका क्या थी और क्या उनका किसी आपराधिक गतिविधि से संबंध था।
केंद्र सरकार ने दिया था आश्वासन
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केंद्र सरकार के उस आश्वासन के बाद आया है जिसमें प्रदर्शन के दौरान दर्ज मामलों को वापस लेने की बात कही गई थी।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि 20 जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। साथ ही भविष्य में उसी विरोध प्रदर्शन को लेकर नए मामले दर्ज नहीं किए जाने की बात भी कही गई।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत की भी अदालत ने सराहना की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि दोनों पक्षों ने सकारात्मक रुख अपनाया है और उनके बीच दुश्मनी नहीं है। इसके बाद मामले में समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ।
CJP ने क्यों वापस लिया 5 सितंबर का मार्च?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद CJP ने दिल्ली में 5 सितंबर को प्रस्तावित विरोध मार्च वापस लेने का फैसला किया है।
CJP के प्रवक्ता सौरभ दास ने कहा कि केंद्र सरकार के सकारात्मक आश्वासन और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद संगठन ने मार्च वापस लेने का निर्णय किया है।
संगठन ने अदालत और दोनों पक्षों के वकीलों के प्रति आभार व्यक्त किया और उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को समय पर लागू किया जाएगा।
प्रस्तावित मार्च में उन छात्रों के परिवारों के शामिल होने की बात कही गई थी, जिन्होंने NEET विवाद और परीक्षा से जुड़े घटनाक्रम के बाद कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। इसके अलावा प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती का सामना करने वाले छात्रों के परिवार भी इसमें शामिल होने वाले थे।
पीड़ित परिवारों के मुआवजे पर भी बड़ा निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केवल FIR के मुद्दे पर ही आदेश नहीं दिया, बल्कि NEET-UG 2026 से जुड़े घटनाक्रम में जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों के मुआवजे को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिया है।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार मुआवजे से जुड़े अपने आश्वासन पर कायम है। हालांकि, मुआवजे की प्रक्रिया और तौर-तरीकों को अंतिम रूप देने के लिए सरकार ने तीन महीने का समय मांगा।
अदालत ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर मुआवजे की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।
इससे प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
छात्रों के लिए राहत, लेकिन जांच का रास्ता खुला
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जहां हजारों छात्रों और प्रदर्शनकारियों को राहत मिली है, वहीं गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले कुछ लोगों के खिलाफ जांच जारी रखने की अनुमति देकर अदालत ने कानूनी संतुलन भी बनाए रखा है।
अब आगे की नजर इस बात पर होगी कि संबंधित राज्यों में FIR रद्द करने की प्रक्रिया कितनी तेजी से पूरी होती है और गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के खिलाफ दिल्ली पुलिस की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है।

