नई दिल्ली। बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI की कार्यप्रणाली और उसके अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी और निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मनन कुमार मिश्रा को स्थायी रूप से निर्वाचित अध्यक्ष मानने से इनकार किया है। कोर्ट के निर्देश के बाद अब उनकी भूमिका को नई राज्य बार काउंसिलों और नई बीसीआई के गठन की प्रक्रिया तक सीमित रखने की बात सामने आई है।
इस आदेश का सीधा असर बीसीआई के बड़े नीतिगत फैसलों पर पड़ सकता है। अदालत के मुताबिक, मौजूदा पदाधिकारी नियमित और प्रशासनिक कामकाज संभाल सकते हैं, लेकिन बड़े नीतिगत निर्णयों में अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की सक्रिय भागीदारी और सहमति जरूरी होगी।
मनन मिश्रा के अधिकारों पर क्यों लगी सीमा?
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल बीसीआई के अध्यक्ष पद और उसके कार्यकाल से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से मनन कुमार मिश्रा के लंबे समय से अध्यक्ष पद पर बने रहने को चुनौती दी गई है।
याचिका में दावा किया गया कि मनन मिश्रा वर्ष 2012 से लगातार बीसीआई अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं। साथ ही बीसीआई के नियमों में अध्यक्ष के कार्यकाल को लेकर मौजूद प्रावधानों का भी हवाला दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से बीसीआई नियम 12(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि चेयरमैन का कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इसके बावजूद अप्रैल 2025 की अधिसूचना में मनन मिश्रा का कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया था। इसी व्यवस्था को याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मनन कुमार मिश्रा को फिलहाल स्थायी निर्वाचित अध्यक्ष के रूप में नहीं माना गया है। उनकी भूमिका नई राज्य बार काउंसिलों के चुनाव और उसके बाद नई बीसीआई के गठन की प्रक्रिया तक सीमित रखने की बात कही गई है।
इस दौरान बीसीआई का नियमित प्रशासनिक कामकाज चलता रहेगा। हालांकि बड़े नीतिगत फैसलों पर अकेले निर्णय लेने की गुंजाइश सीमित कर दी गई है।
अदालत के इस रुख से बीसीआई के कामकाज में संस्थागत निगरानी और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों को महत्व मिला है।

नई राज्य बार काउंसिलों के चुनाव पर नजर
सुप्रीम कोर्ट ने नई बीसीआई के गठन की दिशा में राज्य बार काउंसिलों की चुनावी प्रक्रिया को अहम माना है। आदेश के मुताबिक, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से दो सप्ताह के भीतर दो महिला सदस्यों के मनोनयन की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया है।
इसके बाद नई राज्य बार काउंसिलें अपने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और बीसीआई प्रतिनिधि का चुनाव करेंगी। इन्हीं प्रक्रियाओं के आगे बढ़ने के बाद नई बीसीआई के गठन का रास्ता साफ होगा।
मामले में अगली सुनवाई 17 सितंबर को होने की बात कही गई है। इसलिए आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने वाली चुनावी और प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण रहेगी।
BCI के ‘पर्ल फर्स्ट’ ट्रस्ट पर भी उठे सवाल
मामले में केवल अध्यक्ष के कार्यकाल का मुद्दा ही नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने बीसीआई द्वारा बनाए गए ‘पर्ल फर्स्ट’ ट्रस्ट को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि मनन कुमार मिश्रा समेत कुछ लोग ट्रस्ट में व्यक्तिगत क्षमता में लाइफ मैनेजिंग ट्रस्टी हैं। यह ट्रस्ट गोवा में अंतरराष्ट्रीय कानूनी शिक्षा और अनुसंधान से जुड़ी गतिविधियों के लिए विश्वविद्यालय संचालित करता है।
इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत के समक्ष मामले की आगे की सुनवाई और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही स्पष्ट होगा।
NALSAR विवाद ने भी बढ़ाई थी चर्चा
मनन मिश्रा हाल के दिनों में NALSAR से जुड़े एक विवाद को लेकर भी चर्चा में आए थे। बीसीआई ने 2026 बैच के NALSAR छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। यह कार्रवाई छात्रों के एक वर्ग द्वारा दीक्षांत समारोह में CJI की मौजूदगी को लेकर आपत्ति जताए जाने के बाद सामने आई थी।
बाद में बीसीआई ने अपना फैसला वापस ले लिया और मनन मिश्रा की ओर से छात्रों से माफी मांगे जाने की जानकारी सामने आई। इस घटनाक्रम के बाद बीसीआई के भीतर से भी उनके इस्तीफे की मांग उठी।
इसी पृष्ठभूमि में उनके लंबे कार्यकाल और बीसीआई के कामकाज को लेकर उठे सवालों ने कानूनी रूप ले लिया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
अब आगे क्या होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण नजर नई राज्य बार काउंसिलों के चुनाव और नई बीसीआई के गठन पर होगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रक्रिया किस गति से आगे बढ़ती है और मनन मिश्रा की भूमिका को लेकर आगे क्या स्थिति बनती है, यह अगली सुनवाई में और स्पष्ट हो सकता है।
फिलहाल अदालत के आदेश ने बीसीआई के नेतृत्व और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दे दी है। बड़े नीतिगत फैसलों में अतिरिक्त संवैधानिक और संस्थागत भागीदारी की व्यवस्था के कारण आने वाले दिनों में बीसीआई का कामकाज खास तौर पर निगरानी में रहेगा।

