Wheat Price: देश में खाद्य वस्तुओं की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता के बीच अब गेहूं के बाजार से भी बड़ी खबर सामने आई है। करीब चार साल बाद भारत सरकार ने गेहूं और इससे जुड़े उत्पादों जैसे आटा, मैदा और सूजी के निर्यात पर लगी रोक हटा दी है। इसके बाद कई कृषि मंडियों में गेहूं के भाव में तेजी देखने को मिली है। कुछ मंडियों में कीमतें करीब ₹150 प्रति क्विंटल या उससे ज्यादा बढ़ गई हैं।
हालांकि राहत की बात यह है कि इस तेजी का असर फिलहाल खुदरा बाजार में उसी अनुपात में दिखाई नहीं दे रहा है। देश में गेहूं का औसत खुदरा भाव करीब ₹31.58 प्रति किलोग्राम बताया जा रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में कीमतों में अंतर है और कुछ बाजारों में यह ₹22 से लेकर ₹55 प्रति किलो तक दर्ज की गई है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मंडियों में गेहूं लगातार महंगा होता गया तो क्या आने वाले दिनों में आटा और दूसरी गेहूं आधारित चीजों की कीमत भी बढ़ सकती है?
निर्यात खुलते ही मंडियों में क्यों बढ़े गेहूं के भाव?
भारत में गेहूं का घरेलू बाजार काफी बड़ा है। गेहूं की बड़ी मात्रा खाद्य सुरक्षा, सरकारी खरीद, आटा मिलों और घरेलू खपत के लिए इस्तेमाल होती है। ऐसे में जब निर्यात का रास्ता खुलता है तो कारोबारियों को घरेलू गेहूं के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बिक्री का विकल्प मिल जाता है।
इसी वजह से निर्यात की अनुमति के बाद मंडियों में कारोबारी गतिविधियां बढ़ने और कीमतों पर दबाव आने की संभावना बनी है।
उत्तर प्रदेश की मंडियों में भी इसका असर देखने को मिला है। उदाहरण के तौर पर लखनऊ मंडी में गेहूं का भाव 17 अगस्त को करीब ₹2,466 प्रति क्विंटल था, जो बढ़कर लगभग ₹2,640 प्रति क्विंटल बताया गया। इसी तरह हरदोई में दारा किस्म के गेहूं की कीमत करीब ₹2,408 से बढ़कर ₹2,553 प्रति क्विंटल तक पहुंचने की बात सामने आई है।
यानी कुछ बाजारों में तेजी साफ दिखाई दे रही है।
क्या खुदरा बाजार में आटा महंगा होगा?
मंडी और खुदरा बाजार की कीमतों के बीच सीधा और तत्काल संबंध नहीं होता। किसानों और मंडियों से गेहूं खरीदने के बाद आटा मिलों, परिवहन, भंडारण और पैकेजिंग समेत कई लागत जुड़ती हैं। इसलिए मंडी भाव बढ़ने के तुरंत बाद किराना दुकानों पर आटे की कीमत उसी अनुपात में बढ़ना जरूरी नहीं है।
फिलहाल सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में गेहूं का औसत खुदरा भाव करीब ₹31.58 प्रति किलो है। इसलिए अभी आम उपभोक्ता पर बड़ा असर दिखाई नहीं दे रहा है।
हालांकि यदि मंडियों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है और अगले सीजन में उत्पादन प्रभावित होता है, तो आटा और गेहूं से जुड़े दूसरे उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

सरकारी गोदामों में गेहूं का कितना स्टॉक है?
गेहूं की कीमतों में संभावित तेजी को समझने के लिए सरकारी स्टॉक सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक 2025-26 में भारत का गेहूं उत्पादन करीब 12.06 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले साल के करीब 11.79 करोड़ टन उत्पादन से अधिक है।
इसके अलावा भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के आंकड़ों के अनुसार 1 अगस्त तक सरकारी गेहूं भंडार करीब 5.05 करोड़ टन था। यह पिछले पांच वर्षों में ऊंचे स्तरों में शामिल है।
यही स्टॉक फिलहाल घरेलू बाजार के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकता है। अगर कीमतों में ज्यादा तेजी आती है तो सरकारी भंडार और बाजार हस्तक्षेप की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
अल नीनो ने क्यों बढ़ाई चिंता?
गेहूं की कीमतों पर केवल निर्यात नीति का असर नहीं पड़ता। मौसम भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। आने वाले रबी सीजन में अगर मौसम प्रतिकूल रहता है और फसल की पैदावार प्रभावित होती है, तो घरेलू बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
इसी संदर्भ में अल नीनो की संभावित स्थिति को लेकर भी कारोबारी और उद्योग जगत सतर्क है। अगर उत्पादन उम्मीद से कम रहा और दूसरी तरफ निर्यात मांग बढ़ी, तो घरेलू कीमतों पर दोहरा दबाव बन सकता है।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो के कारण गेहूं की कीमत निश्चित रूप से बढ़ेगी। वास्तविक स्थिति अगले रबी सीजन की मौसम परिस्थितियों और उत्पादन पर निर्भर करेगी।
भारत से कितना गेहूं एक्सपोर्ट हो पाएगा?
निर्यात प्रतिबंध हटने के बावजूद भारत से बड़े पैमाने पर गेहूं निर्यात की राह पूरी तरह आसान नहीं दिख रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारतीय गेहूं की अंतरराष्ट्रीय कीमत कई प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अधिक हो सकती है।
कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि कांडला बंदरगाह पर भारतीय गेहूं का FOB मूल्य करीब 325 डॉलर प्रति टन था, जबकि कुछ दूसरे देशों का गेहूं करीब 295 डॉलर प्रति टन या उससे कम कीमत पर उपलब्ध था।
इस अंतर के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं की प्रतिस्पर्धात्मकता सीमित रह सकती है। ऐसे में निर्यात नीति खुलने के बावजूद बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट तुरंत शुरू हो जाए, यह जरूरी नहीं है।
आम आदमी के लिए फिलहाल क्या मतलब है?
फिलहाल गेहूं के दाम में मंडी स्तर पर तेजी जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन खुदरा बाजार में इसका व्यापक असर अभी सामने नहीं आया है। पर्याप्त सरकारी स्टॉक भी एक बड़ी राहत है।
लेकिन अगर निर्यात बढ़ता है, वैश्विक कीमतें ऊंची रहती हैं और अगले रबी सीजन में मौसम की वजह से उत्पादन प्रभावित होता है, तो आने वाले महीनों में गेहूं और आटे की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए फिलहाल स्थिति को ‘गेहूं महंगा होने की शुरुआत’ के बजाय निगरानी वाले चरण के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।

