संयुक्त राष्ट्र महासभा: में दुनिया के नक्शे को लेकर पारित एक प्रस्ताव के बाद भारत के रुख को लेकर चर्चा तेज हो गई है। प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्र प्रक्षेपों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, जिनमें दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों और क्षेत्रों के वास्तविक क्षेत्रफल को पारंपरिक नक्शों की तुलना में अधिक संतुलित तरीके से दिखाया जा सके। भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया है, लेकिन इसके साथ ही विदेश मंत्रालय ने देश की संप्रभुता और आधिकारिक मानचित्र को लेकर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को ‘Correct the Map: Rebalancing Global Cartographic Representation and Promoting Equal Representation of the World’s Regions’ शीर्षक वाला प्रस्ताव अपनाया। इसका मकसद दुनिया के क्षेत्रों को नक्शों पर उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात के अधिक करीब दिखाने वाली कार्टोग्राफिक प्रणालियों को प्रोत्साहित करना है।
आखिर किस तरह के नक्शे को लेकर है पूरा मामला?
नक्शा बनाने के लिए अलग-अलग मैप प्रोजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। पृथ्वी गोलाकार है, जबकि उसे कागज या स्क्रीन पर दो आयामों में दिखाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में क्षेत्रफल, दूरी, दिशा या आकार में किसी न किसी तरह का बदलाव हो सकता है।
कुछ पारंपरिक मानचित्र प्रक्षेप उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के आसपास के क्षेत्रों को वास्तविक आकार से काफी बड़ा दिखा सकते हैं। ऐसे में ‘इक्वल-एरिया’ यानी समान क्षेत्रफल को बेहतर ढंग से दर्शाने वाले प्रक्षेपों की चर्चा होती रही है।
यूएन के इस प्रस्ताव का जोर इसी तरह की कार्टोग्राफिक प्रणालियों को बढ़ावा देने पर है, ताकि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित नजर आए।
क्या यूएन ने किसी एक खास विश्व मानचित्र को मंजूरी दे दी?
यहीं पर भारत की ओर से महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण सामने आया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रस्ताव किसी एक विशेष विश्व मानचित्र को अपनाने या प्रमाणित करने वाला फैसला नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र ने किसी खास नक्शे को दुनिया का आधिकारिक राजनीतिक नक्शा घोषित कर दिया है। प्रस्ताव का मुख्य विषय मानचित्रों में क्षेत्रफल के प्रतिनिधित्व से जुड़ा है।
भारत ने इसी बिंदु पर जोर दिया है कि इस प्रस्ताव को किसी विशेष मैप प्रोजेक्शन या किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के किसी खास चित्रण की स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में क्यों किया मतदान?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। भारत के अनुसार, दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक संतुलित तरीके से प्रदर्शित करने का मूल सिद्धांत महत्वपूर्ण है।
हालांकि, भारत ने अपने वोट की व्याख्या में यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्ताव को राजनीतिक मानचित्रण से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
यानी भारत का समर्थन मानचित्रों में क्षेत्रफल के अधिक वास्तविक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत तक सीमित है। इसे भारत की राष्ट्रीय सीमाओं अथवा किसी विवादित क्षेत्र को लेकर किसी नई स्थिति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर भारत ने क्या कहा?
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात भारत का जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर दोहराया गया रुख है।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत का संप्रभु क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
भारत का कहना है कि देश के क्षेत्र का कोई भी गलत, भ्रामक या विकृत चित्रण स्वीकार्य नहीं है। विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर देश की स्थिति स्पष्ट और लगातार एक जैसी रही है।
इसका सीधा संदेश यह है कि भारत यूएन के उस प्रस्ताव का समर्थन करता है जो विश्व मानचित्रों में क्षेत्रफल के बेहतर प्रतिनिधित्व की बात करता है, लेकिन इसका अर्थ भारत की आधिकारिक सीमाओं या क्षेत्रीय दावों में किसी बदलाव की स्वीकृति नहीं है।
क्या प्रस्ताव का संबंध विवादित क्षेत्रों से है?
विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के अनुसार, प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित क्षेत्रों या स्थानों के नाम से जुड़े मुद्दों पर कोई फैसला नहीं किया गया है।
यानी प्रस्ताव को पढ़ते समय भौगोलिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सीमाओं के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी क्षेत्र को नक्शे पर किस अनुपात में दिखाया जाए और किसी क्षेत्र की राजनीतिक या संवैधानिक स्थिति क्या है—दोनों अलग विषय हैं।
इसी वजह से भारत ने अपने वोट के साथ यह स्पष्ट करना जरूरी समझा कि प्रस्ताव को किसी खास राजनीतिक मानचित्र की स्वीकृति के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
‘इक्वल-एरिया’ मैप प्रोजेक्शन क्यों चर्चा में है?
‘इक्वल-एरिया’ मैप प्रोजेक्शन का उद्देश्य नक्शे पर विभिन्न क्षेत्रों के क्षेत्रफल के अनुपात को यथासंभव सही तरीके से बनाए रखना होता है। इससे खास तौर पर अफ्रीका जैसे बड़े भू-भाग वाले क्षेत्रों का वास्तविक आकार दुनिया के सामने अधिक संतुलित तरीके से दिखाई दे सकता है।
हालांकि, कोई भी मैप प्रोजेक्शन पृथ्वी की गोलाकार सतह को समतल सतह पर पूरी तरह बिना विकृति के नहीं दिखा सकता। अलग-अलग प्रक्षेप अलग-अलग जरूरतों के लिए बनाए जाते हैं।
इसी व्यापक संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव दुनिया के क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाने वाली प्रणालियों को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है।
भारत के लिए इस प्रस्ताव का क्या मतलब है?
भारत के लिए इस प्रस्ताव का समर्थन मुख्य रूप से कार्टोग्राफिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत से जुड़ा है। लेकिन विदेश मंत्रालय का बयान यह सुनिश्चित करता है कि इस समर्थन को भारत की सीमाओं या जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की स्थिति पर किसी तरह के समझौते के रूप में न समझा जाए।
भारत की ओर से दिया गया संदेश दो स्तरों पर साफ है—पहला, दुनिया के नक्शों में विभिन्न क्षेत्रों का वास्तविक आकार बेहतर तरीके से दिखना चाहिए और दूसरा, भारत की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता को लेकर उसकी आधिकारिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

